एक अजीब-सी मुश्किल में हूं इन दिनों
मेरी भरपूर नफरत कर सकने की ताकत
दिनोंदिन क्षीण पड़ती जा रही है।
अग्रेंजो से नफरत करना चाहता
तो शैक्सपीयर आड़े आ जाते
जिनके मुझ पर न जाने कितने एहसान हैं।
मुसलमानों से नफरत करने चलता
तो सामने गालिब आकर खड़े हो जाते
अब आप ही बताइए- किसकी कुछ चलती है उनके सामने?
सिखों से नफरत करना चाहता
तो गुरु नानक आंखों में छा जाते
और सिर अपने आप झुक जाता
और ये कंबन, त्याग राजा, मुट्टु स्वामी…
लाख समझाता अपने को कि ये मेरे नहीं
दूर कहीं दक्षिण के हैं
पर मन मन है कि मानता ही नहीं बिना इन्हें अपनाएं !!
और वह प्रेमिका जिससे मुझे पहला धोखा हुआ था
मिल जाए तो उसका खून कर दूं!
मिलती भी है, मगर कभी मित्र कभी मां कभी बहन की तरह
तो प्यार का घूंट पीकर रह जाता।
हर समय
पागलों की तरह भटकता रहता
कि कहीं कोई ऐसा मिल जाए
जिससे भरपूर नफरत कर के
अपना जी हलका कर लूं!
पर होता है इसका ठीक उल्टा
कोई-न-कोई, कहीं-न-कहीं, कभी-न-कभी
ऐसा मिल जाता
जिससे प्यार किए बिना रह ही नहीं पाता ]]
दिनोंदिन मेरा यह प्रेम-रोग बढ़ता ही जा रहा
और इस वहम ने पक्की जड़ पकड़ ली है
कि यह प्रेम किसी दिन मुझे स्वर्ग दिखाकर ही रहेगा !!!