ऋणी

ये खुला आसमान जब
धरती की अनदेखी भाप
अपने आप मे समाता है
और गरजकर बरसता है
उसी धरती पर
जितना लिया था उससे
कई गुना ज्यादा देता है
ठीक वैसेही
जैसे
मेरी चंद पंक्तिया
कविता बन बरसती है
ये धरती उस आसमान की
सदैव ऋणी है !!

जन्म

अति तर्क काढू नये शहाण्याने
कशी रात्र सरते कसा सूर्य येतो
उरे ना तयाच्या करी अंती काही
जसा रिक्त येतो तसा रिक्त जातो
कशाला वहावी फुले आसवांची
सडा कोरड्या पाकळ्यांचाच होतो
अनामिक आशेत कर्तृत्व आहे
कुठे भाग्यरेषेत मृत्यू पहातो
जगावे असे की आजचि अंत आहे
दुजा दिवस येता नवा जन्म होतो

किस क़दर सीधा सहल साफ़ है रस्ता देखो (गुलज़ार )

किस क़दर सीधा सहल साफ़ है रस्ता देखो
न किसी शाख़ का साया है न दीवार की टेक
न किसी आँख की आहट न किसी चेहरे का शोर
दूर तक कोई नहीं कोई नहीं कोई नहीं

चंद क़दमों के निशाँ हाँ कभी मिलते हैं कहीं
साथ चलते हैं जो कुछ दूर फ़क़त चंद क़दम
और फिर टूट के गिर जाते हैं ये कहते हुए
अपनी तन्हाई लिए आप चलो, तन्हा अकेले
साथ आए जो यहाँ कोई नहीं कोई नहीं

किस क़दर सीधा सहल साफ़ है रस्ता देखो..

Happy Women’s day !!

from #SitaWarriorOfMithila

Sita to Bharat

Seriously, can you say that the Feminine way never degenerates? The only difference, is that it deteriorates differently. The Masculine way is ordered, efficient and fair at its best, but fanatical and violent at its worst. The Feminine way is creative, passionate and caring at its best, but decadent and chaotic at its worst. No one way of life is better or worse. They both have their strengths and weaknesses.’

Freedom is good, but in moderation. Too much of it is a recipe for disaster. That’s why the path I prefer is that of Balance. Balance between the Masculine and the Feminine.

Bharat to Sita

I believe there is no such thing as too much freedom. For freedom has, within itself, the tools for self-correction.’

Yes. In the Feminine way, when things get too debauched and decadent, many who are disgusted by it, use the same freedom available to them, to revolt and speak out loud. When society is made aware, and more importantly, is in reforms will begin. No problem remains hidden in a Feminine agreement society for too long But Masculine societies can remain in denial for ages because they simply do not have the freedom to question and confront their issues. The Masculine way is based on compliance and submission to the code, the law. The questioning spirit is killed; and with that, the ability to and solve their problems before they lead to chaos.

Rummaging Rumi’s

1 I am so small I can barely be seen.
How can this great love be inside me?
Look at your eyes. They are small,
but they see enormous things.

2 You are not a drop in the ocean. You are the entire ocean, in a drop

3 Your task is not to seek for love, but merely to seek and find all the barriers within yourself that you have built against it.

4 Sell your cleverness and buy bewilderment. Cleverness is mere opinion. Bewilderment brings intuitive knowledge.

5 The minute I heard my first love story I started looking for you, not knowing how blind that was. Lovers don’t finally meet somewhere. They’re in each other all along.

6 Goodbyes are only for those who love with their eyes. Because for those who love with heart and soul there is no such thing as separation.

7 When I am with you, we stay up all night. When you’re not here, I can’t go to sleep.

8 Out beyond ideas of wrongdoing
and rightdoing there is a field.
I’ll meet you there.
When the soul lies down in that grass
the world is too full to talk about.Ideas, language, even the phrase ‘each other’
doesn’t make any sense.

9 why struggle to open the door between us when the whole wall is just an illusion.

अबोल

मौनाला नसते भाषा असतो केवळ अर्थ
उलगडता सारे सोपे अथवा सारे व्यर्थ

त्या फुलांचे श्वास वाऱ्यावर वाहे सुवास
कोमेजून मग ती ठेवती फक्त आभास

सागरी तटावरी होडी तुफान ओढूनि नेई
परतुनी किनाऱ्याला ती गाळ घेऊनि येई

मिळतील कैक धागे जुळतील रेशीमगाठी
तोडता तुटत नाही हवी एक जीवनासाठी

खडकांचे होती देव खडकांची होते माती
दोहोंच्या ठायी सारे कर रिक्त घेऊन येति

तो सूर्य उगवतो रोज पृथ्वीची सोडूनि मिठी
तिच्याच दूर जातो तिलाच उजळण्यासाठी

हे सारे अबोल असूनि वचने अनेक करती
शब्दाना उरले नाही ते भाव जगाला देती

कहानी

चुन चुन के पिरोया हुआ मोतियों का हार है
एक अकेली कहानी के अनगिनत किरदार है

कुछ जात पात से बने और कुछ घात पात से
मेल मिलाप से हुए और बने कुछ आघात से
हर एक मोती से जैसे जुड़ा हुआ व्यापार है
एक अकेली कहानी के अनगिनत किरदार है

मिले कुछ ऐसे कभी लालच भरे आंख में
आंखों से ही बोलनेवाले है इसी कहानी में
और दो हातो से देनेवाले भी यही बेशुमार है
इस अकेली कहानि के अनगिनत किरदार है

हाथो को थामनेवाले थे कुछ बेफिकर ऐसे
एक पटरी पर चलती ट्रेन के मुसाफिर जैसे
कोई उतरता स्टेशन पे कोई होता सवार है
यहा अकेली कहानी के अनगिनत किरदार है

मुकम्मल यहा कुछ नही गर्दिश में हर तारा है
पूरी हुई कहानी का शीर्षक मात्र अधूरा है
लेकिन इस अधूरेपन का मुझे बड़ा आधार है
मेरी अकेली कहानी के अनगिनत किरदार है

अकेला जो आता है जाता भी अकेला है
आते जाते यहा कुछ न तू लेनेवाला है
अधूरे शीर्षक की कहानी का पूरा ये सार है
हर एक की कहानी में अनगिनत किरदार है

उडान

मैं
महज अठरा साल की ..
अपने नए पंख खोले हुए
उड़ने की ख्वाहिश में
दिशाहीन , अर्थहीन
शून्य की ओर
हँसते हँसते चल पड़ी हु
क्योंकि हँसना मेरी आदत है

कुछ साल बाद ……

मैं
चालीस के ऊपर
उड़ने की असफल कोशिशो के बाद
थककर अपने ही पंख काटके
घुटनो के बल चलती हुई
अब भी दिशाहीन , अर्थहीन
शून्य की ओर बढ़ते हुए
हँसते हँसते रेंगती हुई
क्योंकि हँसना मेरी सहूलियत
और जरूरत है

उसी वक्त…..

वो
महज अठरा साल की
अपने नए पंखो के साथ
दो पुराने , टूटे हुए पंख जोड़कर
पूरी तरह , अर्थपूर्ण
हेतुपुर्ण आशाएं लिए
उड़ान के लिए तैयार
हँसते मुस्कुराते
क्योंकि मुस्कान न उसकी आदत है
न सहूलियत , न जरूरत
वो उसके शरीर का एक हिस्सा है !

जीवात जीव आहे

धमन्यात वाहणारे हे रक्त लाल आहे
वाट नागमोडी पण जीवात जीव आहे
म्हणतील चार लोक बेभान पोर सुटली
पदरात गुंतलेली परसात वाढलेली
जाईल सर्व जरी ती भेदून वृक्षवेली
अंतरातुनी परी ती वृंदावनात राहे
ही वाट नागमोडी पण जीवात जीव आहे
जगले उगा कधी ती क्षण आपुले म्हणोनि
मिटले हळूच डोळे कर आडवे करुनि
ओल्या मीठीत नयने हळुवार सावरूनि
ओठात वेदनेची एक चोरमाळ राहे
हि वाट नागमोडी पण जीवात जीव आहे
तिज लाख दोष देती हितगुज सांगण्याचे
मिळतील शाप काही चढलेल्या पायरीचे
पण सुख भोगते ती त्या मोकळ्या मनाचे
जोवरी भाग्य तिजला तोवरी सौख्य राहे
ही वाट नागमोडी पण जीवात जीव आहे
येईल परतूनि ती तिज कामना न कुठली
अव्यक्त भावनांना व्यक्त होऊन त्यजली
परिणीत ही अशी न आपलीच उरली
बाह्यातूनि जरी ती संपूर्ण शांत राहे
ही वाट नागमोडी पण जीवात जीव आहे

पाहिले वळून मला ( सुरेश भट )

कळे न काय कळे एवढे कळून मला
जगून मीच असा घेतसे छळून मला

तुरुंग हाच मला सांग तू कुठे नाही?
मिळेल काय असे दूरही पळून मला

पुसू कुणास कुठे राख राहिली माझी?
उगीच लोक खुळे पाहती जळून मला

खरेच सांग मला.. काय ही तुझीच फुले?
तुझा सुगंध कसा ये न आढळून मला?

जरी अजून तुझे कर्ज राहिले नाही
अजून घेत रहा जीवला पिळून मला

उजाडलेच कसे? ही उन्हे कशी आली?
करी अजून खुणा चंद्र मावळून मला

कधीच हाक तुझी हाय ऐकली नाही
अखेर मीच पुन्हा पाहिले वळून मला

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