अब उन रास्तो से मेरा वजूद खाली आता है
जिनसे कभी मेरी पहचान हुआ करती थी
खिलते रहे मेरे बाग बगीचे और भी ज्यादा
और उन पेड़ो पर बसंत की बहार भी न थी
जड़े कटती रही , टूटते रही हर एक ईंट
हाहाकार करती मेरी आवाज अनसुनी थी
मैं हर इक इल्जाम अपने सर लेती हूं
गुनाह मेरा है तो सजा भी मेरी होनी थी
वक्त भर देता है हर एक जख्म रोजाना
पुराने एल्बम को अगर मैं सामने न रखती !!
(बांट के अपना चेहरा माथा आंखें जाने कहां गई
फटे पुराने इक एल्बम में चंचल लड़की जैसी मां.) -निदा फ़ाज़ली
