पुराना एल्बम

अब उन रास्तो से मेरा वजूद खाली आता है
जिनसे कभी मेरी पहचान हुआ करती थी
खिलते रहे मेरे बाग बगीचे और भी ज्यादा
और उन पेड़ो पर बसंत की बहार भी न थी
जड़े कटती रही , टूटते रही हर एक ईंट
हाहाकार करती मेरी आवाज अनसुनी थी
मैं हर इक इल्जाम अपने सर लेती हूं
गुनाह मेरा है तो सजा भी मेरी होनी थी
वक्त भर देता है हर एक जख्म रोजाना
पुराने एल्बम को अगर मैं सामने न रखती !!

(बांट के अपना चेहरा माथा आंखें जाने कहां गई
फटे पुराने इक एल्बम में चंचल लड़की जैसी मां.) -निदा फ़ाज़ली

अंतहीन

अंधार शोधतो कोणा?
खटखटतो दारावरी
पण प्रकाश देतो हाक
अलगद ओसरीवरी
जो येईल पुन्हा नव्याने
तो दिवस सुगीचा येवो
आशिष देऊनी ऐसा
अस्ताला सूर्य जावो
जी उभी असेल समोरी
कोणती कोरडी वाट
ती भिजवून जाऊ जाता
श्वासांच्या दवबिंदूत
न जुळली काळ-वेळ
नच जुळले ग्रहतारे
धागे मनामनाचे
बांधून नेऊ सारे
जे जे नश्वर दिसते
ते ते तैसे नसते
ही चराचराची सृष्टी
जणू अंतहीन असते !!

आपला पाऊस

शिडी लावून आभाळाला
थोडे ओले ढग चोरावे
त्यातला थोडा पाऊस
कुशीत घेऊन निजावे

किंवा घ्याव अंगावर
झरझर पाणी चिंबून
आपल्या पुरता पाऊस
आपणच घ्यावा चोरून

वाट नसते बघायची
चार थेंब देईल कोणी
ओंजळीत जपून ठेवाव ,
आपल्या आभाळाच पाणी

अधुरे…

There are only two tragedies in life : one is not getting what one wants and the other is getting it .

Oscar Wilde

( this is by far the most meaningful quote i have ever seen )

शायद इसीलिए छोड़ देती हूं
अपनी कविता की आखरी दो पंक्तिया मैं ,
के सिलसिला बना रहे
गर पूरी करदु किसी दिन
ये अधूरी लिखावट
तो क्या पता
फिर कलम हाथ मे न रहे
हर किस्सा हर कहानी हर वाकिया
जरूरी नही की पूरा कहा जाए
जो कहदी पूरी बात तो शायद
जीने की उम्मीद ही न रहे
लेकिन इन्तजार उसी वक्त का है
के जब किताब का हर पन्ना खुला है
और हर बात पूरी पूरी साफ है
बस ख्वाहिश ये है
के वो वक्त इंतजार कराता रहे !!

सब कुछ कह लेने के बाद ( सर्वेश्वर दयाल सक्सेना )

सब कुछ कह लेने के बाद
कुछ ऐसा है जो रह जाता है,
तुम उसको मत वाणी देना।

वह छाया है मेरे पावन विश्वासों की,
वह पूँजी है मेरे गूँगे अभ्यासों की,
वह सारी रचना का क्रम है,
वह जीवन का संचित श्रम है,
बस उतना ही मैं हूँ,
बस उतना ही मेरा आश्रय है,
तुम उसको मत वाणी देना।

वह पीड़ा है जो हमको, तुमको, सबको अपनाती है,
सच्चाई है-अनजानों का भी हाथ पकड़ चलना सिखलाती है,
वह यति है-हर गति को नया जन्म देती है,
आस्था है-रेती में भी नौका खेती है,
वह टूटे मन का सामर्थ है,
वह भटकी आत्मा का अर्थ है,
तुम उसको मत वाणी देना।

वह मुझसे या मेरे युग से भी ऊपर है,
वह भावी मानव की थाती है, भू पर है,
बर्बरता में भी देवत्व की कड़ी है वह,
इसीलिए ध्वंस और नाश से बड़ी है वह,

अन्तराल है वह-नया सूर्य उगा लेती है,
नये लोक, नयी सृष्टि, नये स्वप्न देती है,
वह मेरी कृति है
पर मैं उसकी अनुकृति हूँ,
तुम उसको मत वाणी देना।

प्रश्न ( कुँवर नारायण )

प्रश्न

तारों की अंध गलियों में
गूँजता हुआ उद्दंड उपहास…

वह मेरा प्रश्न है :

विशाल आडम्बर,
अपनी चुभती दृष्टि की गर्म खोज में मैंने
प्रश्नाहत जिस विराट हिमपुरुष को
गलते हुए देखा…

क्या वह तेरा उत्तर था?

आजकल मैं डरता…(इरशाद कामिल )

आजकल मैं डरता किसी को ख़त नहीं लिखता
कहीं मेरे ख़त को
मेरी उदासी का लिखित सबूत न मान लिया जाये
देखा
कितना झूठा हो गया हूं मैं एहसासों में
इस शहर में आकर

हालांकि मैं चाहता था कि आज की रात
ख़ामोशी की ज़ुबान में
किसी के साथ उम्र जितनी लम्बी बात करूं
लेकिन दीवारें अनकहे बोल सुन-सुन कर थक गयीं

दीवारों को कानों पर हाथ रखे देखा
तो अधसोये लफ़्ज़ों कोे जगाया
क्योंकि अब मैं ख़त बन कर
उन आंखों के सामने खड़ा होना चाहता हूं
जिनमें हौसला हो सपने देखने का

तुम इस वहम में मत पड़ जाना
कि मैं ख़ुद को सपना कह रहा हूं
सपना इंसान नहीं हो सकता
इंसान सपना हो सकता है
अब मैं तुम्हारे सामने हूं
अगर तुम्हारी ख़ुदपसन्दी कम हुई हो

तो मुझे उदासी की बात करने की इजाज़त दो
देखना कहीं मेरी बात सुन कर
तुम आईना मन बन जाना
इस समय मैं अपना अक्स नहीं देखना चाहता
गर कहीं सचमुच ख़ुद को
ख़ुशियों से बेगाना पाया
तो ख़त के आख़िर में
'तेरा अपना' लिखने की ज़ुर्रत कहां से लाऊंगा

नहीं बन सकता अगर होठों की हंसी 
माथे की शिकन भी क्यों बनूं वैसे मैं तुम्हें ये नहीं कहना चाहता था
कच्चे दूध की मिठास जैसे कड़वे दोस्त
मैं तो ये कहना चाहता था
अपने अन्दर सुलगती आग पर
लापरवाहियों की पानी मत डाल
ऐसा न हो
अन्दर ही अन्दर कुछ ठंडा हो जाये
जिस्म से 
बर्फ़ की तरह भाप निकलने लगे
तुम सवाल कर सकते हो
'तुमने गर्मजोशी से क्या पाया'

गर्मजोशी ने
मुझे पहले रेगिस्तान जैसे कुछ बना दिया
अब किसी 
वीरान रेगिस्तान में खोई
नदी की आंख का आंसू हूं

काश! मैं सड़क किनारे का दरख़्त होता
तुम मेरी टहनियों में घोंसना बना सकती थीं
अफ़सोस! समय ने मुझे
चौराहे पर लगी सलीब बना दिया है
समय कभी-कभी कैसे एहसान कर देता है
इंसान को मार के भगवान कर देता है सोच 
भगवान होने के बाद
कितना अकेलापन घेर लेता है
क़ैद होता है वो सुनसान चारदीवारी में
मेरी तरह दीवारों से बातें करता हुआ

एहसानमन्द हूं दोस्त
तुम्हारी उठती गिरती पलकों ने
मुझे बात करने की मोहलत दी
और याद दिलाया उन आंखों को
जिनमें मौसम ने सपने बो दिये थे
फिर मौसम ने ही 
सपनीली ज़मीन को बना दिया था खारे पानी की झील
दोनों ओर जिसके पलकें 
देवदार के दरख़्तों की तरह ख़ामोश
जैसे तपस्या में मौन खड़े तपस्वी

शायद कुछ देर बात करके
न मैंने तुम्हारी तपस्या भंग की होगी 
न तुम्हारे मौन को तोड़ा होगा
अगर ऐसा हो भी गया तो मुझे माफ़ करना
मैं भी तो दीवारों से बातें करता करता थक गया था। 

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