शांत हो गयी दुनिया
जैसे खत्म हो रही हो
क्या पता कल का सूरज
निकलने से इनकार करे
तो चलो इसी बात पे
मसले सारे हल करते है
चाहे शांत है दुनिया
हम चुप्पी तोड़ते है
आज गर चांदनी रात है
तो शायद ये आखरी है
इस डर से ही सही
मौत से पहले
एक दिन जी कर देखते है
हर दिन यही डर रहे
इस डर से सही
अपनी बात होती रहे
तुम आ जाना
दिन के उस तरफ जो शाम है
मैं वहा जाके रुकती हु
तुम्हारा दिन जब खत्म हो
तुम आ जाना
वहा न कोई शोर है
न कोई हंगामा
चारो तरफ धुंआ है
पलके उठाके आना
वो कोई ख्वाब नही
और हकीकत का पता नही
पूरे होश रखकर
नींद से उठकर आना
वहां शायद मैं , मैं न रहू
पर सब कुछ मेरा ही होगा
तुम अपने आप से कहकर
मुझे पहचान लेना
जाते वक्त, वक्त न मीले
बात जो कहनी है
तो अपने बेबस दिल को
वो बात समझा देना
मैं मिलने की आस रखूंगी
बस दिन गिनती रहूंगी
तुम भी मुलाकात की
उम्मीद लेकर आना
मोती
गळाभर दागिने घालायची हौस मला कधीच नव्हती
पण हौषेचा एक दागिना नक्कीच हवा होता
एक सुंदर मोत्याची माळ
एक एक मोती हळुवार पेरलेला
खाली न सांडता अलगद हातावर घेतलेला
त्याच्यासोबत असलेल्या अनेक आठवणी
आणि मग अलगद गळ्याभोवती माळलेला
सौंदर्याचा अलंकार म्हणून फक्त तो एक दागिना
हवा होता मला
पण मोती हातात आलेच नाही ,
खाली सांडले आणि हरवले ,
कोणी त्याला झेलल देखील नाही
का कुणाला ते दिसलेच नाहीत
काही शिंपल्याच्या आतच राहिले
आणि सुकून गेले
आता वाट आहे ,
उरलेल्यांची फुले होतात का त्याची !
तेरी यादे
खो जाऊ खयालो में तो जगा देना
तुम्हारे साथ वक्त का पता नही चलता
एक भवँर है तुम्हारी अनगिनत यादे
उनमे से निकलने का मन नही करता
मेरा साया नही हो तुम नहीं मेरा साथी
जो भी हो मुझे कुछ समझ नही आता
सारे अरमानो को मुट्ठी में बंद कर दिया
बंद मुट्ठी का राज कोई नही जानता
वो सब जो तुम दोहराया करते थे
उन बातो को दिल से मिटाया नही जाता
देखो मैं खो गयी फिर उन्ही खयालो में
तुम्हे भी तो मुझे संभालना नही आता
दुख देकर सवाल करते हो ( मिर्ज़ा ग़ालिब )
दुःख देकर सवाल करते हो,
तुम भी जानम कमाल करते हो,
देख कर पूछ लिया हाल मेरा,
चलो कुछ तो ख्याल करते हो,
शहर-ए दिल में ये उदासियाँ कैसी,
ये भी मुझसे सवाल करते हो,
मरना चाहें तो मर नहीं सकते,
तुम भी जीना मुहाल करते हो,
अब किस-किस की मिसाल दूँ तुम को,
हर सितम बे-मिसाल करते हो।
आठवणी
आठवणी तुझ्या माझ्यातल्या
अगदी थोडक्या पण नेमक्या
काही सुखद काही दुःखद
मोजमाप नसलेल्या क्षणांच्या
विनाकारण जपलेल्या
मृगजळासारख्या
असून नसलेल्या
स्पर्शाची अनुभूती देऊन
निघून गेलेल्या
आणि त्या अनुभूतीला
सतत स्पर्शणाऱ्या,
आठवणी माझ्या
तुझ्या डोळ्यात साठलेल्या
काही घडलेल्या
तर काही ” अघटित ” !!
बर्बाद
सब बोल दिया सब खोल दिया
क्या बाकी है अब क्या रह गया
जो बोल दिया वो सच ही था
जो रह गया समझो बच गया
अब पिछली यादे रुलाती नही
रूह को आके सताती नही
अब वो यादे एक किस्सा है मेरा
मेरे शरीर से जुड़ा हिस्सा है मेरा
मैं उसे काट कर फेक भी न सकू
जिंदा रहते रूह को मार न सकू
गल जाएंगी शायद वो मेरे बाद
इतना तो होना ही था बर्बाद
अब कोई उम्मीद बाकी नही
तारो को तोड़ने की जरूरत नहीं
जो हाथ में चमचमाते है मेरे
मेरे दिलके ही टुकड़े है सारे
उससे कहना (गुलज़ार)
उस से कहना…”
इतना कहा… और फिर गर्दन नीची कर के
देर तलक वो पैर के अँगूठे से मिट्टी खोद-खोदके
बात का कोई बीज था, शायद, ढूंढ़ रही थी
देर तलक खामोश रही…
नाक से सिसकी पोंछ के आख़िर
गर्दन को कन्धे पर डाल के बोली,
“बस… इतना कह देना!”
दोस्त शायर था मेरा (गुलज़ार )
दोस्त शायर था मेरा…
बेतकल्लुफ़ था, किसी बात पे कह दिया मैंने
“मरने से पहले भी तुम, नज़्म कोई कह के मरोगे?”
मुस्कुरा के मुझे देखा, कहा-
“मरने से पहले कोई नज़्म नहीं होती कभी दोस्त
मरने के बाद ही कहता हूं मैं हर नज़्म हमेशा!”
हमसे आया न गया ( देख कबीरा रोया ) गीतकार : राजेन्द्र कृष्ण
हमसे आया न गया, तुमसे बुलाया न गया
फ़ासला प्यार में दोनों से मिटाया न गया
वो घड़ी याद है जब तुम से मुलाकात हुई
एक इशारा हुआ, दो हाथ बढ़े बात हुई
देखते, देखते दिन ढल गया और रात हुई
वो समा आज तलक दिल से भूलाया न गया
क्या खबर थी के मिले हैं तो बिछड़ने के लिए
किस्मतें अपनी बनाई हैं बिगड़ने के लिए
प्यार का बाग़ लगाया था उजड़ने के लिए
इस तरह उजड़ा के फिर हमसे बसाया न गया
याद रह जाती है और वक्त गुजर जाता है
फूल खिलता भी है और खिलके बिखर जाता है
सब चले जाते हैं कब दर्द-ए-जिगर जाता है
दाग जो तूने दिया दिलसे मिटाया न गया