इलाज-ऐ-दर्द-ऐ-दिल

इलाज-ए-दर्द-ए-दिल तुम से मसीहा हो नहीं सकता
तुम अच्छा कर नहीं सकते मैं अच्छा हो नहीं सकता

अदू को छोड़ दो फिर जान भी माँगो तो हाज़िर है
तुम ऐसा कर नहीं सकते तो ऐसा हो नहीं सकता

अभी मरते हैं हम जीने का ता’ना फिर न देना तुम
ये ता’ना उन को देना जिन से ऐसा हो नहीं सकता

तुम्हें चाहूँ तुम्हारे चाहने वालों को भी चाहूँ
मिरा दिल फेर दो मुझ से ये झगड़ा हो नहीं सकता

दम-ए-आख़िर मिरी बालीं पे मजमा’ है हसीनों का
फ़रिश्ता मौत का फिर आए पर्दा हो नहीं सकता

न बरतो उन से अपनाइयत के तुम बरताव ऐ ‘मुज़्तर’
पराया माल इन बातों से अपना हो नहीं सकता

  • मुज़्तर खैराबादी

समर्पण

कुछ समर्पण ऐसे भी
न लेनेवाला न देनेवाला
जान सका न कोई
वो एक अंधेरी रात है
दिखे नही अग्यात है
जो जान लो तो क्या बात है
वो चंचल मन की धारा है
जो अविरत बहती रहती है
बूंद बूंद में एक समर्पण
हर धारा एक दान है
इसकी शीतल ओट में
एक राज है जो खास है
जो ढूंढ लिया तो क्या बात है
वो अर्पण है तन मन से
वो जीवित है समर्पण से
जो राह उसके साथ दो
वो राह सुहानी लगती है
बस दोराहे पर जो चूक गए
तो बढ़ने की क्या बात है
बस जान लो जो सच है
हर वक्त एक समर्पण है
हर दिन एक दीवाना है
हर रात एक मस्तानी है
दोनो का अस्तित्व ही
दोनो का समर्पण है
जो मिल जाए ये दोनो
तो फिर सोचो क्या बात है

खंजर

पीठ के घाव ने की खंजर से मुलाकात
क्या हुआ था जो चलाये मुझपर हाथ
खंजर बोला मैं तो मालिक का गुलाम
काम कराये वो मुझसे होता मैं बदनाम
घाव बोले ऐसी क्या थी उसे मजबूरी ?
बाते मीठी करके क्यों चलाई छुरी ?
बोला खंजर ,उसकी बात वही जाने
काम ऐसे करने के क्या होते है मायने ?
भीतर मेरे झांको नही कोई भेदभाव
जहा चलाये मालिक वही करु घाव
पर जाते जाते एक सलाह मेरी सुनो
कोई कुछ बोले बात न उनकी मानो
अब आगे देखो और थोड़ा संभलो
छोटी दो आंखे पीठ पर भी लगालो

बाते

बाते करो ,बाते करना जरूरी है
बाते करो इन दीवारों से
पक्षी प्राणियों से
पेड़ पत्तियो से
आसमान से जमीन से
बहती नदिया से
या समंदर की लहरो से
पत्थरो से ईंटो से पहाड़ो से
अपनी किताब से या कलम से
बाते करो इन सबसे
क्योंकि ये वो किरणे है जो अमर है
उम्मीद की वो रोशनी है जो नही बुझती
क्योंकि इनसे कोई उम्मीद ही नही रहती
पर मनुष्य से कोई बात मत करना
ये अपने बातो से उम्मीदों के दिए
खुद लगाकर खुद ही बुझा देते है
तो बाते करो हर उस चीज़ से
जो मनुष्यरहित है
क्योंकि बाते करना जरूरी है !!

छंद तुझा मजला

छंद तुझा मजला का मुकुंदा लावियला

अशी कशी रे मी, भुलले सांग तुला

संसारी माझ्या येउनिया का ऐसा

हरि का केला घात पुरा,

का असा रे घननीळा

कशास झाले सासुरवाशीण मी रे

उठता बसता तुझेच चिंतन

कुणा म्हणू रे मम स्वामी, नकळे मी

जोवरी तू मनि माझ्या

गीताचे अमूल्य शब्द -मो. ग. रांगणेकर

श्वास

ती :अरे वाह !आज इकडे कुठे , बरेच दिवसांनी भेटलो , नाही का ?

तो : हो खरच , बरेच दिवस लोटले भेट होऊन .

ती :मग काय म्हणता ?कसं सुरू आहे सगळं ? नौकरी , संसार ….

तो : तेच सकाळी घोडा , संध्याकाळी शेळी ,आणि दिवसभर गाढव . काम काम आणि नुसत काम , श्वास घ्यायला वेळ नाही. घर , नौकरी तेच आपलं नेहमीचं . सुखी आयुष्य !! घराचे हफ्ते संपत आलेत , मग भरपूर सेविंग्स , म्हातारपणाची सोय …..वगैरे वगैरे

ती : वाह एकंदरीत सगळं ताळ्यावर आहे , सुखी संसार , छान !

तो : तुझं काय ?तू कशी आहेस ?

ती : (त्याचा हात हातात घेऊन ,अलगद आपल्या नाकाच्या अगदी खाली ठेऊन) बघ ! श्वास घेते आहे !आहे अजून जिवंत !!

आधार

स्वैर भैर आकाशाला विहंग करी विहार
वृक्ष राहुनि तटस्थ देई घरट्याला आधार
सळसळ खळखळ उन्मत्त वाहे अनावर
स्थितप्रज्ञ अचल देतो सरितेला आधार
एक चाले वरती करी धान्याला प्रहार
एक खाली निक्षून देई जात्याला आधार
प्रत्यचेंला ताणून जाई रिपूच्या आरपार
धनुष्य देतो नकळत बाणाला आधार
चंचल अवखळ निरंतर चाले कैक विचार
खुळ्या माझ्या मनास तव नेत्रांचा आधार

सुकून

किसी राशन के दुकान पे नही मिलता
जो थैले में भरके घर ले आये कोई
बाजार में आलू टमाटर के साथ
फ्री में मील जाए ये वो धनिया भी नहीं
जो भागोगे इसे ढूंढने तो नही मिलेगा
चुप कर के बैठ जाओ एक जगह
ये चुपके से साथ बैठेगा

इसका होना न होना तो मानने पर है
मानो तो एक गरम चाय की प्याली में
न मानो तो पंचरंगी थाली में भी न मिले
दीवाली के पचास दिए की रोशनी में भी न मिले
जो मंदिर का एक दीपक दे सकता है
जो बारिश की बूंदो में मिलता है
नकी बोतल के पानी में

जो हजारो की भीड़ में खोया है
और एक इंसान में छुपा है
जो मेरा तो है पर
मेरी अमानत कहकर तुम्हे दिया है
जब मिलोगे तो देना जरूर
मेरा सुकून तुम्हारे पास गिरवी है !

साफ

आसमान अब साफ है
दिन में धूप है रात में तारे है
जंगल में जुगनू है
घर में उजाला है
जो कोहरा था
उसे कलम में भरके
कोरे कागज पे उतार दिया
बहती हुई बारिश की बूदों में
कागज की छोटी छोटी नाव बनाई
और छोड़ दिया
शायद वो पहोंच जाए वहा
जहा उसे जाना है
अब न कोहरा न बारिश
न बादल न आंधी
नीली स्याही लेके तैयार है
मेरा आसमान अब साफ है ।

पुरानी कविता

कल अपनी एक पुरानी कविता पढ़ी
एक एक अक्षर मानो अधूरा सा लगा
एक का दूसरे से कोई नाता नही
सब अलग अलग दिशा में भटकते हुए
कितनी पुरानी थी ये तो पता नही
पर कितनी अधूरी थी ये पता है
खास बात तो ये की जब लिखी गयी
तब वो मुकम्मल लगी ,
मानो पूनम का चाँद
पर अब धूल हटाके जब हाथ आयी
तो लगा मानो ये मेरी थी ही नहीं
किसी और ने मेरे डायरी में आकर
कुछ अल्फाज भर दिए
और मैने उसे अपना नाम दे दिया
जिसे मैं अपनी कविता समझ जतन कर गयी
वो तो कभी मेरी थी ही नही
मेरे पास सिर्फ उसका अधूरापन था !!

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