सत्य ( अज्ञेय )

खोज़ में जब निकल ही आया
सत्य तो बहुत मिले ।

कुछ नये कुछ पुराने मिले
कुछ अपने कुछ बिराने मिले
कुछ दिखावे कुछ बहाने मिले
कुछ अकड़ू कुछ मुँह-चुराने मिले
कुछ घुटे-मँजे सफेदपोश मिले
कुछ ईमानदार ख़ानाबदोश मिले ।

कुछ ने लुभाया
कुछ ने डराया
कुछ ने परचाया-
कुछ ने भरमाया-
सत्य तो बहुत मिले
खोज़ में जब निकल ही आया ।

कुछ पड़े मिले
कुछ खड़े मिले
कुछ झड़े मिले
कुछ सड़े मिले
कुछ निखरे कुछ बिखरे
कुछ धुँधले कुछ सुथरे
सब सत्य रहे
कहे, अनकहे ।

खोज़ में जब निकल ही आया
सत्य तो बहुत मिले
पर तुम
नभ के तुम कि गुहा-गह्वर के तुम
मोम के तुम, पत्थर के तुम
तुम किसी देवता से नहीं निकले:
तुम मेरे साथ मेरे ही आँसू में गले
मेरे ही रक्त पर पले
अनुभव के दाह पर क्षण-क्षण उकसती
मेरी अशमित चिता पर
तुम मेरे ही साथ जले ।

तुम-
तुम्हें तो
भस्म हो
मैंने फिर अपनी भभूत में पाया
अंग रमाया
तभी तो पाया ।

खोज़ में जब निकल ही आया,
सत्य तो बहुत मिले-
एक ही पाया ।

पहचान ( अमृता प्रीतम )

तुम मिले
तो कई जन्म
मेरी नब्ज़ में धड़के
तो मेरी साँसों ने तुम्हारी साँसों का घूँट पिया
तब मस्तक में कई काल पलट गए–

एक गुफा हुआ करती थी
जहाँ मैं थी और एक योगी
योगी ने जब बाजुओं में लेकर
मेरी साँसों को छुआ
तब अल्लाह क़सम!
यही महक थी जो उसके होठों से आई थी–
यह कैसी माया कैसी लीला
कि शायद तुम ही कभी वह योगी थे
या वही योगी है–
जो तुम्हारी सूरत में मेरे पास आया है
और वही मैं हूँ… और वही महक है…

इस मोड़ से तुम मुड़ गई, फिर राह सूनी हो गई! (दुष्यंत कुमार )

मालूम था मुझको कि हर धारा नदी होती नहीं
हर वृक्ष की हर शाधन्खयवाद फूलों से लदी होती नहीं
फिर भी लगा जब तक कदम आगे बढ़ाऊँगा नहीं,
कैसे कटेगा रास्ता यदि गुनगुनाऊँगा नहीं,
यह सोचकर सारा सफ़र, मैं इस कदर धीरे चला
लेकिन तुम्हारे साथ फिर रफ़्तार दूनी हो गई!

तुमसे नहीं कोई गिला, हाँ, मन बहुत संतप्त है,
हर एक आँचल प्यार देने को नहीं अभिशप्त है,
हर एक की करुणा यहाँ पर काव्य की थाती नहीं
हर एक की पीड़ा यहाँ संगीत बन पाती नहीं
मैंने बहुत चाहा कि अपने आँसुओं को सोख लूँ
तड़पन मगर उस बार से इस बार दूनी हो गई।

जाने यहाँ, इस राह के, इस मोड़ पर है क्या वजह
हर स्वप्न टूटा इस जगह, हर साथ छूटा इस जगह
इस बार मेरी कल्पना ने फिर वही सपने बुने,
इस बार भी मैंने वही कलियाँ चुनी, काँटे चुने,
मैंने तो बड़ी उम्मीद से तेरी तरफ देखा मगर
जो लग रही थी ज़िन्दगी दुश्वार दूनी हो गई!

इस मोड़ से तुम मुड़ गई, फिर राह सूनी हो गई!

Me

In the vows and ties and knots
Somewhere lies broken bonds
And it’s unnoticed for ages
Lacks the realization and attention
Like a huge tree with green leaves
Is being eaten by the termites
Creak ! It will fall with lost breath
All will gather to see what’s beneath
Broken inch by inch you see nothing
No breath no life no meaning to the pain
Nothing comes in for life’s bargain
So waste happened without haste
And moved on with same state
Adjusting those little corners bizarre
Unnoticed pugmarks are seen so far
And while having too much of thee
I had very little of my own and me

तेरी बातें ( अहमद फ़राज )

तेरी बातें ही सुनाने आए
दोस्त भी दिल ही दुखाने आए

फूल खिलते हैं तो हम सोचते हैं
तेरे आने के ज़माने आए

ऐसी कुछ चुप सी लगी है जैसे
हम तुझे हाल सुनाने आए

इश्क़ तन्हा है सर-ए-मंज़िल-ए-ग़म
कौन ये बोझ उठाने आए

अजनबी दोस्त हमें देख कि हम
कुछ तुझे याद दिलाने आए

दिल धड़कता है सफ़र के हंगाम
काश फिर कोई बुलाने आए

अब तो रोने से भी दिल दुखता है
शायद अब होश ठिकाने आए

क्या कहीं फिर कोई बस्ती उजड़ी
लोग क्यूँ जश्न मनाने आए

सो रहो मौत के पहलू में ‘फ़राज़’
नींद किस वक़्त न जाने आए

ये इतने लोग कहाँ जाते हैं सुबह-सुबह / कुमार विश्वास

ये इतने लोग कहाँ जाते हैं सुबह-सुबह?
ढेर सी चमक-चहक चेहरे पे लटकाए हुए
हंसी को बेचकर बेमोल वक़्त के हाथों
शाम तक उन ही थक़ानो में लौटने के लिए
ये इतने लोग कहाँ जाते हैं सुबह-सुबह?

ये इतने पाँव सड़क को सलाम करते हैं
हरारतों को अपनी बक़ाया नींद पिला
उसी उदास और पीली सी रौशनी में लिपट
रात तक उन ही मकानों में लौटने के लिए
ये इतने लोग कहाँ जाते हैं सुबह-सुबह?
शाम तक उन ही थकानांे में लौटने के लिए!

ये इतने लोग, कि जिनमे कभी मैं शामिल था
ये सारे लोग जो सिमटे तो शहर बनता है
शहर का दरिया क्यों सुबह से फूट पड़ता है
रात की सर्द चट्टानों में लौटने के लिए
ये इतने लोग कहाँ जाते हैं सुबह-सुबह?
शाम तक उन ही थकानों में लौटने के लिए!

ये इतने लोग क्या इनमें वो लोग शामिल हैं
जो कभी मेरी तरह प्यार जी गए होंगे?
या इनमें कोई नहीं जि़न्दा सिर्फ़ लाशें हैं
ये भी क्या जि़न्दगी का ज़हर पी गए होंगे?
ये सारे लोग निकलते हैं घर से, इन सबको
इतना मालूम है, जाना है, लौट आना है

ये सारे लोग भले लगते हों मशीनों से
मगर इन जि़न्दा मशीनों का इक ठिकाना है
मुझे तो इतना भी मालूम नहीं जाना है कहाँ?
मैंने पूछा नहीं था, तूने बताया था कहाँ?
ख़ुद में सिमटा हुआ, ठिठका सा खड़ा हूँ ऐसे
मुझपे हँसता है मेरा वक़्त, तेरे दोनों जहाँ

जो तेरे इश्क़ में सीखे हैं रतजगे मैंने
उन्हीं की गूँज पूरी रात आती रहती है
सुबह जब जगता है अम्बर तो रौशनी की परी
मेरी पलकों पे अंगारे बिछाती रहती है
मैं इस शहर में सबसे जुदा, तुझ से, ख़ुद से
सुबह और शाम को इकसार करता रहता हूँ

मौत की फ़ाहशा औरत से मिला कर आँखें
सुबह से जि़न्दगी पर वार करता रहता हूँ
मैं कितना ख़ुश था चमकती हुई दुनिया में मेरी
मगर तू छोड़ गया हाथ मेरा मेले में
इतनी भटकन है मेरी सोच के परिंदों में
मैं ख़ुद से मिलता नहीं भीड़ में, अकेले में

जब तलक जिस्म ये मिट्टी न हो फिर से, तब तक
मुझे तो कोई भी मंजि़ल नज़र नहीं आती
ये दिन और रात की साजि़श है, वगरना मेरी
कभी भी शब नहीं ढलती, सहर नहीं आती
तभी तो रोज़ यही सोचता रहता हूँ मैं
ये इतने लोग कहाँ जाते हैं सुबह-सुबह

चल उंच उंच जाऊ ( सलील कुलकर्णी )

चल उंच-उंच जाऊ, चंद्रास हात लाऊ

आहेत पावलांशी पथलीप तारकांचे
नक्षत्रमग्न वाटा आणि धुके तमाचे
ओठात चांदण्यांचे तेजाळ गीत ठेऊ
चल उंच-उंच जाऊ, चंद्रास हात लाऊ

केव्हा कसे निघलो? आलो इथे नी कैसे?
क्षण एक-एक जुळुनी झाली प्रकाशवर्षे
अस्वस्थ त्या क्षणांच्या हातात चंद्र देऊ
चल उंच-उंच जाऊ, चंद्रास हात लाऊ

अस्तित्व अन लयाचा झुलला झुला जिथून
दिसतात त्या धरेच्या साऱ्या कला इथून
चल आपुलेच असणे आता दुरून पाहू
चल उंच-उंच जाऊ, चंद्रास हात लाऊ

सलील कुलकर्णी

आंख मे पानी रखो ( राहत इंदोरी )

आँख में पानी रखो होंठों पे चिंगारी रखो,
जिंदा रहना है तो तरकीबें बहुत सारी रखो !

राह के पत्थर से बढ़ कर कुछ नहीं हैं मंज़िलें,
रास्ते आवाज़ देते हैं सफर जारी रखो !

एक ही नदी के हैं ये दो किनारे दोस्तों,
दोस्ताना ज़िन्दगी से मौत से यारी रखो !

आते जाते पल ये कहते हैं हमारे कान में,
कुछ का ऐलान होने को है तैयारी रखो !

ये ज़रूरी है की आँखों का भरम कायम रहे,
नींद रखो या न रखो ख्वाब मे यारी रखो !

ये हवाएं उड़ न जाएँ ले के काग़ज़ का बदन,
दोस्तों मुझ पर कोई पत्थर ज़रा भारी रखो !

ले तो आये शायरी बाजार में “राहत” मियाँ,
क्या जरूरी है कि लहजे को बाज़ारी रखो !!

अब के बिछडे तो .. ( अहमद फ़राज )

अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें
जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें
ढूँढ उजड़े हुए लोगों में वफ़ा के मोती
ये ख़ज़ाने तुझे मुम्किन है ख़राबों में मिलें
तू ख़ुदा है न मेरा इश्क़ फ़रिश्तों जैसा
दोनों इंसाँ हैं तो क्यों इतने हिजाबों में मिलें
ग़म-ए-दुनिया भी ग़म-ए-यार में शामिल कर लो
नश्शा बढ़ता है शराबें जो शराबों में मिलें
आज हम दार पे खेंचे गये जिन बातों पर
क्या अजब कल वो ज़माने को निसाबों में मिलें
अब न वो मैं हूँ न तू है न वो माज़ी है “फ़राज़”
जैसे दो शख़्स तमन्ना के सराबों में मिलें

खाली

थामे हुए हाथ भी कभी कभी खाली लगते है
बरसो पुराने रिश्ते न जाने क्यों जाली लगते है

न कानो पर यकीन न आंखों पर भरोसा है
चाशनी में जहर मिला के थाली में परोसा है

शुरू ही कब हुए थे जो अब खत्म करते है
खुदसे मिलने की ख्वाहिश हम भी रखते है

जबान से निकले हुए लब्ज़ बेमतलब से है
हवा कौनसी इन्हें किसीके कानो में ले जाती है

खुश है इस बात पर की फिरभी जिंदा है
खुशनसीबी का ढोंग अब हमने सीख लिया है

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