तेरी बातें ही सुनाने आएदोस्त भी दिल ही दुखाने आए फूल खिलते हैं तो हम सोचते हैंतेरे आने के ज़माने आए ऐसी कुछ चुप सी लगी है जैसेहम तुझे हाल सुनाने आए इश्क़ तन्हा है सर-ए-मंज़िल-ए-ग़मकौन ये बोझ उठाने आए अजनबी दोस्त हमें देख कि हमकुछ तुझे याद दिलाने आए दिल धड़कता है सफ़र के …
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ये इतने लोग कहाँ जाते हैं सुबह-सुबह / कुमार विश्वास
ये इतने लोग कहाँ जाते हैं सुबह-सुबह?ढेर सी चमक-चहक चेहरे पे लटकाए हुएहंसी को बेचकर बेमोल वक़्त के हाथोंशाम तक उन ही थक़ानो में लौटने के लिएये इतने लोग कहाँ जाते हैं सुबह-सुबह? ये इतने पाँव सड़क को सलाम करते हैंहरारतों को अपनी बक़ाया नींद पिलाउसी उदास और पीली सी रौशनी में लिपटरात तक उन …
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चल उंच उंच जाऊ ( सलील कुलकर्णी )
चल उंच-उंच जाऊ, चंद्रास हात लाऊ आहेत पावलांशी पथलीप तारकांचेनक्षत्रमग्न वाटा आणि धुके तमाचेओठात चांदण्यांचे तेजाळ गीत ठेऊचल उंच-उंच जाऊ, चंद्रास हात लाऊ केव्हा कसे निघलो? आलो इथे नी कैसे?क्षण एक-एक जुळुनी झाली प्रकाशवर्षेअस्वस्थ त्या क्षणांच्या हातात चंद्र देऊचल उंच-उंच जाऊ, चंद्रास हात लाऊ अस्तित्व अन लयाचा झुलला झुला जिथूनदिसतात त्या धरेच्या साऱ्या कला इथूनचल …
आंख मे पानी रखो ( राहत इंदोरी )
आँख में पानी रखो होंठों पे चिंगारी रखो,जिंदा रहना है तो तरकीबें बहुत सारी रखो ! राह के पत्थर से बढ़ कर कुछ नहीं हैं मंज़िलें,रास्ते आवाज़ देते हैं सफर जारी रखो ! एक ही नदी के हैं ये दो किनारे दोस्तों,दोस्ताना ज़िन्दगी से मौत से यारी रखो ! आते जाते पल ये कहते हैं …
अब के बिछडे तो .. ( अहमद फ़राज )
अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलेंजिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलेंढूँढ उजड़े हुए लोगों में वफ़ा के मोतीये ख़ज़ाने तुझे मुम्किन है ख़राबों में मिलेंतू ख़ुदा है न मेरा इश्क़ फ़रिश्तों जैसादोनों इंसाँ हैं तो क्यों इतने हिजाबों में मिलेंग़म-ए-दुनिया भी ग़म-ए-यार में शामिल कर लोनश्शा बढ़ता है शराबें जो शराबों …
मिर्ज़ा ग़ालिब
मेहरबाँ हो के बुला लो मुझे चाहो जिस वक़्तमैं गया वक़्त नहीं हूँ कि फिर आ भी न सकूँ ज़ोफ़ में ताना-ए-अग़्यार का शिकवा क्या हैबात कुछ सर तो नहीं है कि उठा भी न सकूँ ज़हर मिलता ही नहीं मुझ को सितमगर वर्नाक्या क़सम है तिरे मिलने की कि खा भी न सकूँ
कोई दिन गर जिंदगांनी(मिर्झा गालिब )
कोई दिन गर ज़िंदगानी और है अपने जी में हम ने ठानी और है आतिश-ए-दोज़ख़ में ये गर्मी कहाँ सोज़-ए-ग़म-हा-ए-निहानी और है बार-हा देखी हैं उन की रंजिशें पर कुछ अब के सरगिरानी और है दे के ख़त मुँह देखता है नामा-बर कुछ तो पैग़ाम-ए-ज़बानी और है क़ाता-ए-एमार है अक्सर नुजूम वो बला-ए-आसमानी और है …
कातरवेळ
कुण्या एका खिन्न कातरवेळीमालवतो दिवा उरते काजळीवाटेवर अंधाराला प्रश्न माझापुढे किती खळगे नि खाचाउजेडाची वाट शोधता शोधतातुझ्यात देतो का थोडी शांतता !!
एकदाच ओंजळीत .. ( संदीप खरे )
एकदाच ओंजळीत दे ना जाई-जुई एकदाच ओंजळीत दे ना जाई-जुई कोण जाणे पुन्हा कधी गाठभेट होई अगदीच हळूवार नको राजरोषपाकळी एक नको डवरली घोसपानासाठी कवितेच्या देना खुण काहीएकदाच ओंजळीत दे ना जाई-जुई क्षण एक थांब अशी हवीशी होऊनएकदाच मनी तुला घेतो चितारूनआणि तुझ्या मौनाचीच चित्रावर सहीएकदाच ओंजळीत दे ना जाई-जुई एकदाच ओंजळीत दे ना जाई-जुई …
“साठीचा गजल” कविवर्य विंदा करंदीकर
हे चंद्र, सूर्य, तारे होते तिच्याच पाठी. आम्हीहि त्यात होतो– खोटे कशास बोला–त्याचीच ही कपाळी बारीक एक आठी ! उगवायची उषा ती अमुची तिच्याच नेत्रीअन मावळावयाची संध्या तिच्याच ओठी ! दडवीत वृद्ध होते काठी तिला बघून,नेसायचे मुमुक्षू इस्त्री करून छाटी ! जेव्हा प्रदक्षिणा ती घालीच मारुतीलातेव्हा पहायची हो मूर्ती वळून पाठी ! प्रत्यक्ष भेटली का …