तुम ना जाने, किस जहां में खो गएहम भरी दुनियाँ में, तन्हां हो गए मौत भी आती नहीं, आस भी जाती नहींदिल को ये क्या हो गया, कोई शय भाती नहींलूट कर मेरा जहां, छूप गए हो तुम कहाँतुम ना जाने, किस जहाँ… एक जान और लाख गम, घुट के रह जाए ना दमआओ तुमको …
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रात आँखों में ढली पलकों पे जुगनूँ आए
रात आँखों में ढली पलकों पे जुगनूँ आएहम हवाओं की तरह जाके उसे छू आए बस गई है मेरे अहसास में ये कैसी महककोई ख़ुशबू में लगाऊँ तेरी ख़ुशबू आए उसने छू कर मुझे पत्थर से फिर इंसान कियामुद्दतों बाद मेरी आँखों में आँसू आए मेरा आईना भी अब मेरी तरह पागल हैआईना देखने जाऊँ …
दुख देकर सवाल करते हो ( मिर्ज़ा ग़ालिब )
दुःख देकर सवाल करते हो,तुम भी जानम कमाल करते हो, देख कर पूछ लिया हाल मेरा,चलो कुछ तो ख्याल करते हो, शहर-ए दिल में ये उदासियाँ कैसी,ये भी मुझसे सवाल करते हो, मरना चाहें तो मर नहीं सकते,तुम भी जीना मुहाल करते हो, अब किस-किस की मिसाल दूँ तुम को,हर सितम बे-मिसाल करते हो।
उससे कहना (गुलज़ार)
उस से कहना…”इतना कहा… और फिर गर्दन नीची कर केदेर तलक वो पैर के अँगूठे से मिट्टी खोद-खोदकेबात का कोई बीज था, शायद, ढूंढ़ रही थीदेर तलक खामोश रही…नाक से सिसकी पोंछ के आख़िरगर्दन को कन्धे पर डाल के बोली,“बस… इतना कह देना!”
दोस्त शायर था मेरा (गुलज़ार )
दोस्त शायर था मेरा…बेतकल्लुफ़ था, किसी बात पे कह दिया मैंने“मरने से पहले भी तुम, नज़्म कोई कह के मरोगे?”मुस्कुरा के मुझे देखा, कहा-“मरने से पहले कोई नज़्म नहीं होती कभी दोस्तमरने के बाद ही कहता हूं मैं हर नज़्म हमेशा!”
हमसे आया न गया ( देख कबीरा रोया ) गीतकार : राजेन्द्र कृष्ण
हमसे आया न गया, तुमसे बुलाया न गयाफ़ासला प्यार में दोनों से मिटाया न गयावो घड़ी याद है जब तुम से मुलाकात हुईएक इशारा हुआ, दो हाथ बढ़े बात हुईदेखते, देखते दिन ढल गया और रात हुईवो समा आज तलक दिल से भूलाया न गयाक्या खबर थी के मिले हैं तो बिछड़ने के लिएकिस्मतें अपनी …
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इलाज-ऐ-दर्द-ऐ-दिल
इलाज-ए-दर्द-ए-दिल तुम से मसीहा हो नहीं सकतातुम अच्छा कर नहीं सकते मैं अच्छा हो नहीं सकता अदू को छोड़ दो फिर जान भी माँगो तो हाज़िर हैतुम ऐसा कर नहीं सकते तो ऐसा हो नहीं सकता अभी मरते हैं हम जीने का ता’ना फिर न देना तुमये ता’ना उन को देना जिन से ऐसा हो …
छंद तुझा मजला
छंद तुझा मजला का मुकुंदा लावियला अशी कशी रे मी, भुलले सांग तुला संसारी माझ्या येउनिया का ऐसा हरि का केला घात पुरा, का असा रे घननीळा कशास झाले सासुरवाशीण मी रे उठता बसता तुझेच चिंतन कुणा म्हणू रे मम स्वामी, नकळे मी जोवरी तू मनि माझ्या गीताचे अमूल्य शब्द -मो. ग. रांगणेकर
जोगीण ( कुसुमाग्रज )
साद घालशीलतेव्हाच येईनजितकं मागशीलतितकच देईन दिल्यानंतरदेहावेगळ्यासावलीसारखीनिघून जाईन. तुझा मुगुटमागणार नाहीसभेत नातंसांगणार नाही माझ्यामधल्यातुझेपणातजोगीण बनूनजगत राहीन. __कुसुमाग्रज
पत्र लिही पण ( इंदिरा संत )
पत्र लिही पण नको पाठवू शाई मधूनी काजळ गहिरेलिपीरेशान्च्या जाळीमधूनी नको पाठवू हसू लाजरे.चढण लाडकी भूवई मधली नको पाठवू वेलान्टीतूननको पाठवू तीळ गालीचा पूर्णविरामाच्या बिन्दूतूनशब्दामधूनी नको पाठवू अक्ष्ररामधले अधीरे स्पन्दननको पाठवू कागदातूनी स्पर्शामधला कम्प विलक्शणनको पाठवू वीज सूवासिक उलगडणारी घडीघडीतूननको पाठवू असे कितीदा सान्गीतले मी : तू हट्टी पण !पाठवीशी ते सगळे सगळे पहील्या ओळीमधेच …