एक होकार दे, फार काही नकोफार काही नको, फक्त ‘नाही’ नको |एकदा दोनदा ठीक आहे सखेतुझे लाजणे असे बारमाही नको | थेट स्पर्शातुनी बोल काहीतरीगूढ शब्दातली नेहमी मौन ग्वाही नको | आपले भेटणे हीच एक कोजागिरीमग चांदणेही नको, चांदवा ही नको |
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कविता ( शांता शेळके )
शेवटची ओळ लिहीलीआणि तो दूर झालाआपल्या कवितेपासूनबराचसा थकलेलापण सुटकेचे समाधानही अनुभवणाराप्रसूतीनंतरच्या ओल्या बाळंतीणीसारखाजरा प्रसन्न, जरा शांतनाही खंत, नाही भ्रांत…. आणि ती कविता नवजातएकाकी, असहाय, पोरकीआधाराचे बोट सुटलेल्याअजाण पोरासारखीभांबावलेली, भयभीत,अनुभवणारी एका उत्कट नात्याचीपरिणती विपरीत ती आहे आता पडलेलीकागदाच्या उजाड माळावरआपल्या अस्तिवाचा अर्थ शोधततो मैलोगणती दूर, वेगळ्या विश्वातसंपूर्ण, संतुष्ट, आत्मरत!
पुन्हा पुन्हा चुकण्यासाठी ( सुधीर मोघे )
क्षणोक्षणी चुका घडतात,आणि श्रेय हरवून बसतात.आपल्याच रिकाम्या ओंजळी आपल्यालाफार काही शिकवत असतात.कणभर चुकीलाहीआभाळाएवढी सजा असते,चुक आणि शिक्षा यांची कधीताळेबंदी मांडायची नसतेएक कृती, एक शब्दएकच निमिष हुकतं-हुकतंउभ्या जन्माच्या चुकामुकीलातेवढं एक निमित्त पुरतंअखेर हे सारं घडतं केवळ आपण काही शिकण्यासाठीआपण मात्र शिकत असतोपुन्हा पुन्हा चुकण्यासाठी!
असेन मी नसेन मी ( शांता शेळके )
असेन मी, नसेन मी, तरी असेल गीत हेफुलाफुलांत येथल्या उद्या हसेल गीत हे हवेत ऊन भोवती, सुवास धुंद दाटलेतसेच काहिसे मनी, तुला बघून वाटलेतृणांत फुलापाखरू तसे बसेल गीत हे स्वयें मनात जागते, न सूर ताल मागतेअबोल राहुनी स्वतः अबोध सर्व सांगतेउन्हें जळांत हालती तिथे दिसेल गीत हे कुणास काय ठाउके, कसे कुठे उद्या असूनिळ्या नभांत …
कुल्फी ( सौम्य जोशी )
लगता है के पिघल गयी मगर नहीं, नहीं, नहीं वो थी जहाँ अब है वहीं कुल्फी, कुल्फी हाँ, मीठी-मीठी माज़ी की कुल्फी हज़ार तंज़ कस गई हज़ार गाँठ बंध चुकी खुलेगी ना गठरी कभी ये सोचा था, पर खुल गई पिघलेगी नहीं वो कभी कुल्फी जो चल रहा था थम गया जो थम गया था …
अभंग ( संत तुकाराम )
मन करा रे प्रसन्न । सर्व सिद्धीचे कारण। मोक्ष अथवा बंधन । सुख समाधान इच्छा ते ॥१॥ मने प्रतिमा स्थापिली । मनें मना पूजा केली । मनें इच्छा पुरविली । मन माउली सकळांची ॥ध्रु.॥ मन गुरू आणि शिष्य । करी आपुलें चि दास्य । प्रसन्न आपआपणास । गति अथवा अधोगति ॥२॥ साधक वाचक पंडित श्रोते …
जो नही कहा गया ( अज्ञेय )
है,अभी कुछ जो कहा नहीं गया । उठी एक किरण, धायी, क्षितिज को नाप गई,सुख की स्मिति कसक भरी,निर्धन की नैन-कोरों में काँप गई,बच्चे ने किलक भरी, माँ की वह नस-नस में व्याप गई।अधूरी हो पर सहज थी अनुभूति :मेरी लाज मुझे साज बन ढाँप गई-फिर मुझ बेसबरे से रहा नहीं गया।पर कुछ और रहा …
सत्य ( अज्ञेय )
खोज़ में जब निकल ही आयासत्य तो बहुत मिले । कुछ नये कुछ पुराने मिलेकुछ अपने कुछ बिराने मिलेकुछ दिखावे कुछ बहाने मिलेकुछ अकड़ू कुछ मुँह-चुराने मिलेकुछ घुटे-मँजे सफेदपोश मिलेकुछ ईमानदार ख़ानाबदोश मिले । कुछ ने लुभायाकुछ ने डरायाकुछ ने परचाया-कुछ ने भरमाया-सत्य तो बहुत मिलेखोज़ में जब निकल ही आया । कुछ पड़े मिलेकुछ …
पहचान ( अमृता प्रीतम )
तुम मिलेतो कई जन्ममेरी नब्ज़ में धड़केतो मेरी साँसों ने तुम्हारी साँसों का घूँट पियातब मस्तक में कई काल पलट गए– एक गुफा हुआ करती थीजहाँ मैं थी और एक योगीयोगी ने जब बाजुओं में लेकरमेरी साँसों को छुआतब अल्लाह क़सम!यही महक थी जो उसके होठों से आई थी–यह कैसी माया कैसी लीलाकि शायद तुम …
इस मोड़ से तुम मुड़ गई, फिर राह सूनी हो गई! (दुष्यंत कुमार )
मालूम था मुझको कि हर धारा नदी होती नहींहर वृक्ष की हर शाधन्खयवाद फूलों से लदी होती नहींफिर भी लगा जब तक कदम आगे बढ़ाऊँगा नहीं,कैसे कटेगा रास्ता यदि गुनगुनाऊँगा नहीं,यह सोचकर सारा सफ़र, मैं इस कदर धीरे चलालेकिन तुम्हारे साथ फिर रफ़्तार दूनी हो गई! तुमसे नहीं कोई गिला, हाँ, मन बहुत संतप्त है,हर …
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