रानातला मोगरा

वेगळ व्हावं स्वतःपासून
स्वतःला नव्याने शोधायला
अंगावरची कात काढून
पुन्हा नव्याने  जगायला
हाथ धरून दरवेळी
कुणी येत नसत सांभाळायला
जमिनीशी राहावं लागतं
आपलाच तोल जपायला
दोन दिवस दुःख करून
जग लागतच की कामाला
आपले सुख दुःख
द्यावे आपल्याच ओंजळीला
कुठे अडतय कुणाचं
सारेच बघतात पळायला
एकांतच उरतो शेवटी
एकटेपणा घालवायला
अबोल असावे काहीतरी
सार नकोच कळायला
गर्द रान मिळाले जसे
शुभ्र कोवळ्या मोगऱ्याला !!

समझौता ( निदा फ़ाज़ली )

यही ज़मीं
जो कहीं धूप है
कहीं साया
यही ज़मीन हो तुम भी
यही ज़मीं मैं भी
यही ज़मीन हक़ीक़त है
इस ज़मीं के सिवा
कहीं भी कुछ नहीं
बीनाइयों का धोका है
वो आसमान
जो हर दस्तरस से बाहर है
तुम्हारी
आँखों में हो
या मेरी निगाहों में
दिखाई देता है
लेकिन कभी नहीं मिलता
यही ज़मीन सफ़र है
यही ज़मीं मंज़िल
न मैं तलाश करूँ
तुममें
जो नहीं हो तुम
न तुम
तलाश करो मुझमें
जो नहीं हूँ मैं

एकांत माझा ( सुरेश भट )

हजार काजव्यांनी पाहिला एकांत माझा,
तुझ्याच आठवांनी उजळला एकांत माझा.

नको जगा विचारू हासण्याचे गुपित माझ्या,
कित्येक हुंदक्यांनी, कोंडला एकांत माझा.

हळूच तू मुक्याने छेडला आलाप केव्हा?
हळूच रे मुक्याने भंगला एकांत माझा.

तुझ्याच वागण्याचा बांधते अंदाज आता
तुझ्यात हा असा रेंगाळला एकांत माझा.

अखेर भेटला नाहीस एकांती मला तू,
तुझ्यासवेच तेव्हा संपला एकांत माझा.

दुरून आज मजला हाक आली ओळखीची,
चुकून चांदण्यानी ऐकला एकांत माझा.

(सुरेश भट जन्मदिनानिमित्त )

कुछ पंक्तीया ( केदारनाथ सिंघ )

शहर के पार जो दिखता है वो घर मेरा है
जो बसा ही नहीं अब तक वो शहर मेरा है

करोगे जितनी बार क़त्ल फिर उग आएगा
वही है आपका बाजू वही सर मेरा है

उन्हें मंजि़ल की बधाई मुझे रस्ते पे गरूर
उसूल और सफर – और सफर मेरा है

बच गया है जो वहाँ सारे गुणा-भाग के बाद
उसे सँभालकर रखना वो सिफर मेरा है

दे दिया तुझको मुक्तिबोध – हँसके उसने कहा
मगर वो चुप्पा-सा शमशेर इधर मेरा है।

वसीयतनामा (केदारनाथ सिंघ )

मेरी खाल दे दी जाए 
किसी खेत को 
कविताएँ कर दी जाएँ प्रवाहित 
किसी नाले में 
कौओं को दे दिया जाए निमंत्रण 
कि आवें और छज्जे पर बैठकर 
काँव-काँव करें 
मेरा कुर्ता किसी पेड़ को 
दे दिया जाए 
कमीज़ किसी झाड़ी को 
मेरी चिट्ठियाँ भेज दी जाएँ 
किसी और पते पर 
किसी और का नाम लिख दिया जाए 
मेरे नाम की जगह 
मेरा बिस्तर दे दिया जाए 
किसी बेबिस्तर पड़ोसी को 

जो कहता हूँ 
सो मैं कहता हूँ 
पर जो नहीं कहता 
वह पत्थरों को दे दिया जाए 
कि शायद…शायद…
कुछ बोलें।

एक छोटीसी मुलाकात ( सर्वेश्वर दयाल सक्सेना )

कुछ देर और बैठो –
अभी तो रोशनी की सिलवटें हैं
हमारे बीच।

शब्दों के जलते कोयलों की आँच
अभी तो तेज़ होनी शुरु हुई है
उसकी दमक
आत्मा तक तराश देनेवाली
अपनी मुस्कान पर
मुझे देख लेने दो

मैं जानता हूँ
आँच और रोशनी से
किसी को रोका नहीं जा सकता
दीवारें खड़ी करनी होती हैं
ऐसी दीवार जो किसी का घर हो जाए।

कुछ देर और बैठो –
देखो पेड़ों की परछाइयाँ तक
अभी उनमें लय नहीं हुई हैं
और एक-एक पत्ती
अलग-अलग दीख रही है।

कुछ देर और बैठो –
अपनी मुस्कान की यह तेज़ धार
रगों को चीरती हुई
मेरी आत्मा तक पहुँच जाने दो
और उसकी एक ऐसी फाँक कर आने दो
जिसे मैं अपने एकांत में
शब्दों के इन जलते कोयलों पर
लाख की तरह पिघला-पिघलाकर
नाना आकृतियाँ बनाता रहूँ
और अपने सूनेपन को
तुमसे सजाता रहूँ।

कुछ देर और बैठो –
और एकटक मेरी ओर देखो
कितनी बर्फ मुझमें गिर रही है।
इस निचाट मैदान में
हवाएँ कितनी गुर्रा रही हैं
और हर परिचित कदमों की आहट
कितनी अपरिचित और हमलावर होती जा रही है।

कुछ देर और बैठो –
इतनी देर तो ज़रूर ही
कि जब तुम घर पहुँचकर
अपने कपड़े उतारो
तो एक परछाईं दीवार से सटी देख सको
और उसे पहचान भी सको।

कुछ देर और बैठो
अभी तो रोशनी की सिलवटें हैं
हमारे बीच।
उन्हें हट तो जाने दो –
शब्दों के इन जलते कोयलों पर
गिरने तो दो
समिधा की तरह
मेरी एकांत
समर्पित
खामोशी!

होली

एक रंग इतना गहरा चढ़ा के
जिंदगी अब हर रोज होली है
खेले जो आंखों से आंखों तक
दिल की दिल तक रंगीन होली है
और छीटे उड़ति हलकी हलकी
चेहरे पर शांति से कुछ बोली है
महशूर हो गया त्योहार लेकिन
रंगों के बगैर जिंदगी खाली है !!

डर की आत्मकथा

हर जगह मौजूद हु मैं
मगर बोया जाता हूं
एक औरत के अंदर
उसके जनम से भी पहले
और बढ़ता हु उसके
बढ़ते शरीर के साथ ,
दिखता हु उसके बाप के माथे पर
और माँ की आखों में ,
रोकता हु उसे
हर उस जगह जाने से ,
जैसे सुनसान सड़क ,
सुनसान गलिया
अकेले बस , रेलगाड़ी में
रोकता हु उसे अपने ही घर में
और अपनो के घर में
चेहरे पे साफ दिखता हु मैं
और चेहरे पहचानता हु मैं
उसे खींचता हु पीछे
जब वो अपने बाल खुले छोड़कर
अपने कपड़े तंग करती है ,
और ये भी कहता हूं
के वो सुरक्षित नही है
उस बुरखे या साड़ी के अंदर भी
सदियो से उसके साथ
जी रहा हु मैं
भटक रहा हु ,
मगर अब
अब मुक्ति चाहता हु
क्या ये मुमकिन है ?
क्या आप मेरा साथ देंगे ?

#HappyWomen’sDay? #FreedomFromFear?

असीम ( Box of pearls )

‘असीम’ something that’s endless , like sky , ocean. However the most endless thing I know is mind and it’s thoughts. These are few pearls from different poets where they are bang on in making me believe that our thoughts especially those expressed in a poetic way are so endless that one has to literally keep reading them to find an end, and we fail everytime we do so. I am yet not satisfied with the list and hence even this list is असीम…..

1
हजारो ख्वाहिशे ऐसी की हर ख्वाहिश् पे दम निकले
बहोत निकले मेरे अरमान लेकीन फिर भी कम निकले

Mirza Galib

2
वहमों गुमान से दूर दूर…यकीन के हद के पास पास ,
दिल को भरम ये हो गया..कि उनको हम से प्यार है

From Movie silisla (Javed Akhtar)

3
मै और मेरी तनहाई अक्सर ये बातें करते है..
तुम होती तो कैसा होता
तुम ये केह्ती, तुम वो केह्ती
तुम इस बात पे हैरान होती, तुम उस बात पे कितनी हस्ती
तुम होती तो ऐसा होता, तुम होती तो वैसा होता
मै और मेरी तनहाई अक्सर ये बातें करते है

From movie silsila (Javed Akhtar )

4
कोई अधूरा पूरा नहीं होता
और एक नया शुरू होकर
नया अधूरा छूट जाता
शुरू से इतने सारे
कि गिने जाने पर भी अधूरे छूट जाते

परंतु इस असमाप्त –
अधूरे से भरे जीवन को
पूरा माना जाए, अधूरा नहीं
कि जीवन को भरपूर जिया गया

इस भरपूर जीवन में
मृत्यु के ठीक पहले भी मैं
एक नई कविता शुरू कर सकता हूं
मृत्यु के बहुत पहले की कविता की तरह
जीवन की अपनी पहली कविता की तरह

किसी नए अधूरे को अंतिम न माना जाए ।

Vinod kumar shukla

5
जैसे बेबात हँसी आ जाती है
हँसते चेहरों को देख कर

जैसे अनायास आँसू आ जाते हैं
रोते चेहरों को देख कर

हँसी और रोने के बीच
काश,कुछ ऐसा होता रिश्ता
कि रोते-रोते हँसी आ जाती
जैसे हँसते-हँसते आँसू

Kunvar Narayan

6
मैं तैनू फ़िर मिलांगी
कित्थे ? किस तरह पता नई
शायद तेरे ताखियल दी चिंगारी बण के
तेरे केनवास ते उतरांगी
जा खोरे तेरे केनवास दे उत्ते
इक रह्स्म्यी लकीर बण के
खामोश तैनू तक्दी रवांगी

जा खोरे सूरज दी लौ बण के
तेरे रंगा विच घुलांगी
जा रंगा दिया बाहवां विच बैठ के

तेरे केनवास नु वलांगी
पता नही किस तरह कित्थे
पर तेनु जरुर मिलांगी
जा खोरे इक चश्मा बनी होवांगी
ते जिवें झर्नियाँ दा पानी उड्दा
मैं पानी दियां बूंदा
तेरे पिंडे ते मलांगी
ते इक ठंडक जेहि बण के
तेरी छाती दे नाल लगांगी
मैं होर कुच्छ नही जानदी
पर इणा जानदी हां
कि वक्त जो वी करेगा
एक जनम मेरे नाल तुरेगा
एह जिस्म मुक्दा है
ता सब कुछ मूक जांदा हैं
पर चेतना दे धागे

कायनती कण हुन्दे ने
मैं ओना कणा नु चुगांगी
ते तेनु फ़िर मिलांगी

Amrita Pritam

To be continued…..

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