आओ छुप जाते हैं-ख़ुश रहने के बहानों से, कोरे इंतज़ार से, वक़्त के रुकने और तेज़ भागने से, नींद से लंबी रातों से, ढेर सारे सपनों से, अपनी क्षणिक सफलताओं से, हमेशा ठीक दिखने की थकान से, अपेक्षाओं से, भागते रहने से, कमज़ोर क्षणों से, आईनों से, हार से, ईश्वर से, अच्छी बातों से, देश-प्रेम …
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तुम्हारे बारे में…[ मानव कौल] (1)
अचानक लगता है कि कुछ दिन यूँ ही सोते हुए बीत गए हैं। आज की तारीख देखने पर अचरज होता है। हिसाब लगाने बैठो तो पुराने दिन धुंध में डूबे हुए लगते हैं। कुछ पकड़ में आता है, कुछ छूटा रहता हूँ हमेशा के लिए। क्या सच में कुछ छूट जाता है-हमेशा के लिए? क्या …
आईना ( परवीन शकीर )
लड़की सर को झुकाए बैठीकाफ़ी के प्याले में चमचा हिला रही हैलड़का हैरत और मोहब्बत की शिद्दत से पागललाँबी पलकों के लर्ज़ीदा सायों कोअपनी आँख से चूम रहा हैदोनों मेरी नज़र बचा करइक दूजे को देखते हैं हँस देते हैंमैं दोनों से दूरदरीचे के नज़दीकअपनी हथेली पर अपना चेहरा रखेखिड़की से बाहर का मंज़र देख …
माझ्या मित्रा ( अरुणा ढेरे )
ऐक ना,मला दिसते नुसते चमकते अपरंपार आभाळ,अलीकडे दाट काळ्या रात्रीची शांत झुळझुळबासरीच्या एखाद्या माधवी स्वरासारखातीव्रमधुर तिथला वाऱ्याचा वावरआणि मुक्त असण्याची त्यात एक मंद पण निश्चित ग्वाहीकितीदा पाह्यलेय मी हे स्वप्न, झोपेत आणि जागेपणीही ! आज तुला ते सांगावेसे का वाटले कळत नाहीपण थांब, घाई करू नकोस,अर्धे फुललेले बोलणे असे अर्ध्यावर खुडू नाही. हे ऐकताना हसशील, …
अनय ( अरुणा ढेरे )
नक्षत्रांच्या गावातून उतरली होतीस तू त्याच्या घरात;मेघश्याम आभाळाची ओढ तुझ्या रक्तातच होतीहे समजलं होतं त्याला, अगदी पहिल्यापासून,तुझ्या बाईपणाची जात विजेची, शेजेला घेता न येणारीओळखून होता तो आतून, आतून, खोल मनातूनतुझ्या झिळमिळ स्वप्नांच्या मोरपिसांनात्याने कधी देऊ पाहिले नाहीत आपले डोळे,आणि नाही गढूळ केले कधी तुझ्या देहात हिंदकळणारेधुंदमदिर निळे तळे. त्याच्या मृण्मय आयुष्यात उमटली होतीअमराचा अळता लावलेली …
गुलज़ार
एक समंदर जो मेरे काबू में हैऔर इक कतरा है जो संभलता नही,एक जिंदगी है जो तुम्हारे बगैर बितानी हैऔर इक लमहा है जो गुजरता नहीं ।
सिंहासन खाली करो कि जनता आती है । ( रामधारी सिंग दिनकर )
सदियों की ठण्डी-बुझी राख सुगबुगा उठी,मिट्टी सोने का ताज पहन इठलाती है;दो राह, समय के रथ का घर्घर-नाद सुनो,सिंहासन खाली करो कि जनता आती है । जनता ? हाँ, मिट्टी की अबोध मूरतें वही,जाड़े-पाले की कसक सदा सहनेवाली,जब अँग-अँग में लगे साँप हो चूस रहेतब भी न कभी मुँह खोल दर्द कहनेवाली । जनता ? हाँ, लम्बी-बडी …
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मन वढाय … ( बहिणाबाई चौधरी )
मन वढाय वढाय उभ्या पीकांतलं ढोरकिती हांकला हांकला फिरी येतं पिकांवर।। मन मोकाट मोकाट त्याले ठायीं ठायीं वाटाजशा वार्यानं चालल्या पान्यावर्हल्यारे लाटा।। मन लहरी लहरी त्याले हातीं धरे कोन?उंडारल उंडारलं जसं वारा वाहादन।। देवा, कसं देलं मन आसं नहीं दुनियांतआसा कसा रे यवगी काय तुझी करामत।। मन चप्पय चप्पय त्याले नहीं जरा धीरतठे व्हयीसनी ईज …
क्या किया आज तक ( हरिशंकर परसाई )
मैं सोच रहा, सिर पर अपारदिन, मास, वर्ष का धरे भारपल, प्रतिपल का अंबार लगाआखिर पाया तो क्या पाया? जब तान छिड़ी, मैं बोल उठाजब थाप पड़ी, पग डोल उठाऔरों के स्वर में स्वर भर करअब तक गाया तो क्या गाया? सब लुटा विश्व को रंक हुआरीता तब मेरा अंक हुआदाता से फिर याचक बनकरकण-कण …
सप्तपदी के वचन ( अंजना टंडन )
जानती हूँसप्तपदी पर लिएसातवें वचन का मान, बामअंग आने से पूर्व हीमिली थी नियमावलीजिसमें विकल्प नहीं होते, ’’पर पुरूष देखना भी पाप था’’ बस ध्यान ही तब गया जबकिसी नेकाले और सफेद का झूठ ढूँढ निकाला, मालूम नहींये दुस्साहस था या परमार्थउकेर कर रख दी थी उसनेमुझ जैसीकई दारूण गाथाएँ अदब के पन्नों पर, पर …