अचानक लगता है कि कुछ दिन यूँ ही सोते हुए बीत गए हैं। आज की तारीख देखने पर अचरज होता है। हिसाब लगाने बैठो तो पुराने दिन धुंध में डूबे हुए लगते हैं। कुछ पकड़ में आता है, कुछ छूटा रहता हूँ हमेशा के लिए। क्या सच में कुछ छूट जाता है-हमेशा के लिए? क्या इस जन्म में उससे फिर वास्ता नहीं पड़ेगा ? इन सबके बीच में हृदय अपनी एक धड़कन खो देता है। हाथ उठता है और माथा सहलाने लगता है। गहरी साँस लेने से आँखों के किनारे पानी नज़र आता है। ऐसा तब होता है, जब कभी तुम्हारा नाम कहीं दबे हुए के बीच में से छूट जाता है, “ओ मेरी कविता…” मेरे लिए छूटे हुए सघन प्रेम और कविता के बारे में बात करना एक ही है। कहानियों, नाटकों और अभिनय के बीच मैंने तुम्हें कहीं भीतर दबा रखा है, छुपाया नहीं है। तुम छूट गई हो कविता । मैं तुम्हें अब नहीं लिख सकता हूँ। तुम्हारे साथ ख़रीदे मेरे जूते अब मुझे काटते हैं। उनमें रहकर बहुत दूर चला नहीं जाता। ये जूते तब भी काटते थे मुझे, पर लगता था कि वह जूता ही क्या जो हर चाल में अपनी उपस्थिति दर्ज न कराए। अब तुम अनुपस्थित हो, जैसे मेरा पुराना घर इस नए घर में अनुपस्थित है। इस वक़्त भी लिखते हुए तीव्र इच्छा हो रही है कि अभी पीछे पड़े हुए कोरे पन्नों को उठाऊँ और एक कविता लिख डालूँ। मैं तुम्हें महसूस कर सकता हूँ, सूँघ सकता हूँ। मुझे पता है कि दरवाज़े के दूसरी तरफ़ तुम हो, बिना आहट के सिर झुकाए तुम मेरे कोरे पन्ने की तरफ़ बढ़ने का इंतज़ार कर रही हो। लेकिन मैं अब कविता नहीं लिख सकता। कितनी क्रूरता थी इसमें कि तुम मुझे छोड़कर चली गई! तुम्हारे जाने के बाद जाने कितनी लंबी शामें गहरी रातें, नीरस दुपहरें मैंने उन कोरे पन्नों के सामने बिताईं, पर तुम वापिस नहीं आई। दूसरे जब अपनी कविता , सुनाते, मुझे लगता कि यह मेरी ही कविता है जो उनके साथ रहने लगी है— जलन, घनघोर जलन ।
कविता असल में बहुत समय तक टिकती नहीं है। अब आजकल मैं अपनी कहानियों में, अपने अभिनय में, अपने नाटकों में उससे मिल लेता हूँ। हम कुछ देर बैठकर बातें करते हैं, साथ चाय पीते हैं और मैं उसे कुछ देर में चले जाने के लिए कहता हूँ। वह ज़्यादा बुरा नहीं मानती। मुझे भी अब इसका बहुत दुख नहीं होता है ।