श्रावण

वाटते क्षणा क्षणात श्रावण एक असतो
भिजवून अर्धे मुर्धे  ,पुन्हा रुक्ष करतो

तो तळ्या-मळ्याचा खेळ वेड पांघरून येतो
अन बघतो दुरून सारे, साऱ्यातून दूर राहतो

कोवळ्या उन्हाचे छाप हातात लपवून येतो
ओंजळीतले गार पाणी सोबतीला घेऊन जातो

मन भरून येते ऐसे जीव अभाळागत होतो
वरवरी ओली माती अंतरी कोरडी करतो

रे श्रावणा ! तू का घोर जिवाला देतो
घे बरसून आता पूर्ण सृष्टीचा ऋतू बदलतो !!

धरा-बादल

बादल कहता धरती से तू रूठ न जाना अभी
बरसुंगा मैं जल्द ही तू टूट न जाना कभी

देख तेरे ही तो लिए मैने धूप है कितनी खाई
और सूरज से लड़ जगड़कर आंधिया है लाई

हार मानकर कोई कैसे आगे बढ़ा आजतक?
थोड़ी विपदा होगी तुझे मेरे बरस जाने तक

तब तक तू अपना संयम बनाये रखना
मेरे आने तक सृष्टि कों संभाले रखना

धरती मगर नही मानती ये उसकी बात
टूटकर पूरा पूरा करती खुदपर आघात

हर शाख का पत्ता पत्ता सूखा कर देती
नदी नाले सबको कैसे बूंद बूंद तरसाती

बादल तब बरसे जब चाह हो धरतिकी
वो मगर नही जानता बात ये उसके मनकी

फिर एकदिन खूब जोर  बरसता वो टूटकर
धरती जबतलक हो चुकी है राख जल भूनकर !!

सप्तपदी के वचन ( अंजना टंडन )

जानती हूँ
सप्तपदी पर लिए
सातवें वचन का मान,

बामअंग आने से पूर्व ही
मिली थी नियमावली
जिसमें विकल्प नहीं होते,

’’पर पुरूष देखना भी पाप था’’

बस ध्यान ही तब गया जब
किसी ने
काले और सफेद का झूठ ढूँढ निकाला,

मालूम नहीं
ये दुस्साहस था या परमार्थ
उकेर कर रख दी थी उसने
मुझ जैसी
कई दारूण गाथाएँ अदब के पन्नों पर,

पर सच मानो
मैंने कभी नहीं देखा
उसका चेहरा मोहरा
सिवाय शाब्दिक झलक के,

संवेदनशील सह्रदय मित्र सा लगा
और
स्त्री समझ दुख साझा कर लिया,

वास्तव में
वो कोई पर पुरूष नहीं
मेरे ही ईश का कोई टुकड़ा निकला,

स्त्रियाँ जानती हैं
वचनों का मान क्या होता है

हाँ….मैंने सच में नहीं देखा।

लगाया दिल बहोत ( सज्जाद अली)

लगाया दिल बहुत पर दिल लगा नहीं
तेरे जैसा कोई हमको मिला नहीं

ज़माने भर की बातें उनसे कह दीं
जो कहना चाहिए था वो कहा नहीं

वो सच में प्यार था या बचपना था
मोहब्बत हो गयी थी क्या पता नहीं

वो मुझको लग रहा था प्यार मेरा
वो जैसा लग रहा था वैसा था नहीं

ना रोया था बिछड़ने पर मैं उनके
मगर हाँ ज़िदगी में फिर हँसा नहीं

ये तोहफे हैं जो अपनों से मिले हैं
हमें गैरों से कोई भी गिला नहीं

गलत निकला जो बचपन में सुना था
वफ़ा का अज्र मिलता है सजा नहीं

अगर कुछ रह गया है तो बता दो
कहो क्या रह गया है क्या किया नहीं

अगर पढ़ने लगो तो जॉन पढ़ना
बड़े शायर पढ़े ऍसा पढ़ा नहीं

सफर

छोटी स्टील की ट्रंक में
चार कपड़े डाल के
कुछ ताश के पत्ते
और ढेर सारा पकवान
ट्रैन की खिड़की से
कुल्हड़ वाली चाय
और सबके साथ
नमकीन की चुस्कियां लेते हुए
एक सफर ऐसा भी था
जो जाने कब तय कर लिया

खिड़किया अब बंद हो गई थी
दूध की बोतल और
ढेर सारी अटैची में
नन्हे नन्हे कपड़े
थोड़ी सावधानी थोड़ा डर
सफर खतम डर खतम
नींद अब कमजोर थी
अपनी जान अपने हाथो में लिए
एक सफर ऐसा भी था
जाने कब तय कर लिया

सफर अब बेफिक्रे है
आत्मपरीक्षण का साधन है
अपनि एक अटैची में
उलझे है अपने आप मे
न ताश के पत्ते है
न दूध की बोतल है
हाथ मे मोबाइल है
और सारी दुनिया अनजान है
डर भी अब चुप सा है
कही पहुंचने की जल्दी नही
चलता रहता गति की गिनती नही
अब यही सफर  है
ये भी तो तय करना ही है !!

असामान्य

सामान्य सा जीवन हो
सामान्य स्वप्न से उत्पन्न हुई
सामान्य सी इच्छाए हो !!
सीधे रास्ते पे चलते हुए
सीधे साधे लोग और उनकी बातें
जो बोलते हो कुछ ऐसा
दिन की शुरुवात से लेकर
बस रात तक का किस्सा
चकित न होते हो वे अपने या दूसरों के
पहनावे पर , या बोलचाल पर !!
बेमतलब की बातचीत रहे
जिसका कोई अंत नही
शुरू हुई कहाँ से
ये भी किसे याद नही !!
घर मे हो कुछ खाली कोने
मगर  घर खाली न हो
और दीवारों से न लगती हो
मकान की क़ीमत
जहा जेब के वजन पर
इंसान को न तोलते हो !!
भागती हुई भीड़ में
किनारे से धीरे चलना
समय को मुट्ठी में न रख
बस उसके साथ रहना
असामान्य हो रहा है
सामान्य जीवन जीना !!!

अमावस्या !!

पडे आभाळ अपुरे
जीव गुंतता जिवात
हूर हूर लावी मना
रोज सावळा एकांत

चंद्र नसे चांदण्यात
त्याचा चालतो जुगार
वाटे अधिकच शांत
अंधारातला अंधार

व्हावे अकस्मात काही
वीज चमकते जशी
क्षणभर का होईना
देते जाण प्रकाशाची

येणे तुझे असे जसे
पूर्ण चंद्राचे आकाश
जाता परतूनि पुन्हा
उरे रिक्त अमावस !!

तुम मुझे क्षमा करो ( राजकमल चौधरी )

तुम मुझे क्षमा करो

बहुत अंधी थीं मेरी प्रार्थनाएँ।
मुस्कुराहटें मेरी विवश
किसी भी चंद्रमा के चतुर्दिक
उगा नहीं पाई आकाश-गंगा
लगातार फूल-चंद्रमुखी!
बहुत अंधी थीं मेरी प्रार्थनाएँ।
मुस्कुराहटें मेरी विकल
नहीं कर पाई तय वे पद-चिन्ह।
मेरे प्रति तुम्हारी राग-अस्थिरता,
अपराध-आकांक्षा ने
विस्मय ने-जिन्हें,
काल के सीमाहीन मरुथल पर
सजाया था अकारण, उस दिन
अनाधार।
मेरी प्रार्थनाएँ तुम्हारे लिए
नहीं बन सकीं
गान,
मुझे क्षमा करो।
मैं एक सच्चाई थी
तुमने कभी मुझको अपने पास नहीं बुलाया।
उम्र की मखमली कालीनों पर हम साथ नहीं चले
हमने पाँवों से बहारों के कभी फूल नहीं कुचले
तुम रेगिस्तानों में भटकते रहे
उगाते रहे फफोले
मैं नदी डरती रही हर रात!
तुमने कभी मुझे कोई गीत गाने को नहीं कहा।
वक़्त के सरगम पर हमने नए राग नहीं बोए-काटे
गीत से जीवन के सूखे हुए सरोवर नहीं पाटे
हमारी आवाज़ से चमन तो क्या
काँपी नहीं वह डाल भी, जिस पर बैठे थे कभी!
तुमने ख़ामोशी को इर्द-गिर्द लपेट लिया
मैं लिपटी हुई सोई रही।
तुमने कभी मुझको अपने पास नहीं बुलाया
क्योंकि, मैं हरदम तुम्हारे साथ थी,
तुमने कभी मुझे कोई गीत गाने को नहीं कहा
क्योंकि हमारी ज़िन्दगी से बेहतर कोई संगीत न था,
(क्या है, जो हम यह संगीत कभी सुन न सके!)
मैं तुम्हारा कोई सपना नहीं थी, सच्चाई थी!

ख्वाब की तरह (इफ्तिकार आरिफ़)

ख़्वाब की तरह बिखर जाने को जी चाहता है
ऐसी तन्हाई कि मर जाने को जी चाहता है

घर की वहशत से लरज़ता हूँ मगर जाने क्यूँ
शाम होती है तो घर जाने को जी चाहता है

डूब जाऊँ तो कोई मौज निशाँ तक न बताए
ऐसी नदी में उतर जाने को जी चाहता है

कभी मिल जाए तो रस्ते की थकन जाग पड़े
ऐसी मंज़िल से गुज़र जाने को जी चाहता है

वही पैमाँ जो कभी जी को ख़ुश आया था बहुत
उसी पैमाँ से मुकर जाने को जी चाहता है

सूना घर ( दुष्यंत कुमार )

सूने घर में किस तरह सहेजूँ मन को।

पहले तो लगा कि अब आईं तुम, आकर
अब हँसी की लहरें काँपी दीवारों पर
खिड़कियाँ खुलीं अब लिये किसी आनन को।

पर कोई आया गया न कोई बोला
खुद मैंने ही घर का दरवाजा खोला
आदतवश आवाजें दीं सूनेपन को।

फिर घर की खामोशी भर आई मन में
चूड़ियाँ खनकती नहीं कहीं आँगन में
उच्छ्वास छोड़कर ताका शून्य गगन को।

पूरा घर अँधियारा, गुमसुम साए हैं
कमरे के कोने पास खिसक आए हैं
सूने घर में किस तरह सहेजूँ मन को।

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