लगाया दिल बहुत पर दिल लगा नहींतेरे जैसा कोई हमको मिला नहीं ज़माने भर की बातें उनसे कह दींजो कहना चाहिए था वो कहा नहीं वो सच में प्यार था या बचपना थामोहब्बत हो गयी थी क्या पता नहीं वो मुझको लग रहा था प्यार मेरावो जैसा लग रहा था वैसा था नहीं ना रोया …
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तुम मुझे क्षमा करो ( राजकमल चौधरी )
तुम मुझे क्षमा करो बहुत अंधी थीं मेरी प्रार्थनाएँ।मुस्कुराहटें मेरी विवशकिसी भी चंद्रमा के चतुर्दिकउगा नहीं पाई आकाश-गंगालगातार फूल-चंद्रमुखी!बहुत अंधी थीं मेरी प्रार्थनाएँ।मुस्कुराहटें मेरी विकलनहीं कर पाई तय वे पद-चिन्ह।मेरे प्रति तुम्हारी राग-अस्थिरता,अपराध-आकांक्षा नेविस्मय ने-जिन्हें,काल के सीमाहीन मरुथल परसजाया था अकारण, उस दिनअनाधार।मेरी प्रार्थनाएँ तुम्हारे लिएनहीं बन सकींगान,मुझे क्षमा करो।मैं एक सच्चाई थीतुमने कभी मुझको …
ख्वाब की तरह (इफ्तिकार आरिफ़)
ख़्वाब की तरह बिखर जाने को जी चाहता हैऐसी तन्हाई कि मर जाने को जी चाहता है घर की वहशत से लरज़ता हूँ मगर जाने क्यूँशाम होती है तो घर जाने को जी चाहता है डूब जाऊँ तो कोई मौज निशाँ तक न बताएऐसी नदी में उतर जाने को जी चाहता है कभी मिल जाए …
सूना घर ( दुष्यंत कुमार )
सूने घर में किस तरह सहेजूँ मन को। पहले तो लगा कि अब आईं तुम, आकरअब हँसी की लहरें काँपी दीवारों परखिड़कियाँ खुलीं अब लिये किसी आनन को। पर कोई आया गया न कोई बोलाखुद मैंने ही घर का दरवाजा खोलाआदतवश आवाजें दीं सूनेपन को। फिर घर की खामोशी भर आई मन मेंचूड़ियाँ खनकती नहीं …
समझौता ( निदा फ़ाज़ली )
यही ज़मींजो कहीं धूप हैकहीं सायायही ज़मीन हो तुम भीयही ज़मीं मैं भीयही ज़मीन हक़ीक़त हैइस ज़मीं के सिवाकहीं भी कुछ नहींबीनाइयों का धोका हैवो आसमानजो हर दस्तरस से बाहर हैतुम्हारीआँखों में होया मेरी निगाहों मेंदिखाई देता हैलेकिन कभी नहीं मिलतायही ज़मीन सफ़र हैयही ज़मीं मंज़िलन मैं तलाश करूँतुममेंजो नहीं हो तुमन तुमतलाश करो मुझमेंजो …
वसंत (अज्ञेय)
मैं देख रहा हूँझरी फूल से पँखुरी-मैं देख रहा हूँ अपने को ही झरते। मैं चुप हूँ:वह मेरे भीतर वसंत गाता है।
कुछ पंक्तीया ( केदारनाथ सिंघ )
शहर के पार जो दिखता है वो घर मेरा हैजो बसा ही नहीं अब तक वो शहर मेरा है करोगे जितनी बार क़त्ल फिर उग आएगावही है आपका बाजू वही सर मेरा है उन्हें मंजि़ल की बधाई मुझे रस्ते पे गरूरउसूल और सफर – और सफर मेरा है बच गया है जो वहाँ सारे गुणा-भाग …
वसीयतनामा (केदारनाथ सिंघ )
मेरी खाल दे दी जाए किसी खेत को कविताएँ कर दी जाएँ प्रवाहित किसी नाले में कौओं को दे दिया जाए निमंत्रण कि आवें और छज्जे पर बैठकर काँव-काँव करें मेरा कुर्ता किसी पेड़ को दे दिया जाए कमीज़ किसी झाड़ी को मेरी चिट्ठियाँ भेज दी जाएँ किसी और पते पर किसी और का नाम लिख दिया जाए मेरे नाम की जगह मेरा बिस्तर दे दिया जाए किसी बेबिस्तर पड़ोसी …
एक छोटीसी मुलाकात ( सर्वेश्वर दयाल सक्सेना )
कुछ देर और बैठो –अभी तो रोशनी की सिलवटें हैंहमारे बीच। शब्दों के जलते कोयलों की आँचअभी तो तेज़ होनी शुरु हुई हैउसकी दमकआत्मा तक तराश देनेवालीअपनी मुस्कान परमुझे देख लेने दो मैं जानता हूँआँच और रोशनी सेकिसी को रोका नहीं जा सकतादीवारें खड़ी करनी होती हैंऐसी दीवार जो किसी का घर हो जाए। कुछ …
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असीम ( Box of pearls )
‘असीम’ something that’s endless , like sky , ocean. However the most endless thing I know is mind and it’s thoughts. These are few pearls from different poets where they are bang on in making me believe that our thoughts especially those expressed in a poetic way are so endless that one has to literally …