श्रावण

वाटते क्षणा क्षणात श्रावण एक असतोभिजवून अर्धे मुर्धे  ,पुन्हा रुक्ष करतो तो तळ्या-मळ्याचा खेळ वेड पांघरून येतोअन बघतो दुरून सारे, साऱ्यातून दूर राहतो कोवळ्या उन्हाचे छाप हातात लपवून येतोओंजळीतले गार पाणी सोबतीला घेऊन जातो मन भरून येते ऐसे जीव अभाळागत होतोवरवरी ओली माती अंतरी कोरडी करतो रे श्रावणा ! तू का घोर जिवाला देतोघे बरसून …

धरा-बादल

बादल कहता धरती से तू रूठ न जाना अभीबरसुंगा मैं जल्द ही तू टूट न जाना कभी देख तेरे ही तो लिए मैने धूप है कितनी खाईऔर सूरज से लड़ जगड़कर आंधिया है लाई हार मानकर कोई कैसे आगे बढ़ा आजतक?थोड़ी विपदा होगी तुझे मेरे बरस जाने तक तब तक तू अपना संयम बनाये रखनामेरे …

सप्तपदी के वचन ( अंजना टंडन )

जानती हूँसप्तपदी पर लिएसातवें वचन का मान, बामअंग आने से पूर्व हीमिली थी नियमावलीजिसमें विकल्प नहीं होते, ’’पर पुरूष देखना भी पाप था’’ बस ध्यान ही तब गया जबकिसी नेकाले और सफेद का झूठ ढूँढ निकाला, मालूम नहींये दुस्साहस था या परमार्थउकेर कर रख दी थी उसनेमुझ जैसीकई दारूण गाथाएँ अदब के पन्नों पर, पर …

लगाया दिल बहोत ( सज्जाद अली)

लगाया दिल बहुत पर दिल लगा नहींतेरे जैसा कोई हमको मिला नहीं ज़माने भर की बातें उनसे कह दींजो कहना चाहिए था वो कहा नहीं वो सच में प्यार था या बचपना थामोहब्बत हो गयी थी क्या पता नहीं वो मुझको लग रहा था प्यार मेरावो जैसा लग रहा था वैसा था नहीं ना रोया …

सफर

छोटी स्टील की ट्रंक मेंचार कपड़े डाल केकुछ ताश के पत्तेऔर ढेर सारा पकवानट्रैन की खिड़की सेकुल्हड़ वाली चायऔर सबके साथनमकीन की चुस्कियां लेते हुएएक सफर ऐसा भी थाजो जाने कब तय कर लिया खिड़किया अब बंद हो गई थीदूध की बोतल औरढेर सारी अटैची मेंनन्हे नन्हे कपड़ेथोड़ी सावधानी थोड़ा डरसफर खतम डर खतमनींद अब …

असामान्य

सामान्य सा जीवन होसामान्य स्वप्न से उत्पन्न हुईसामान्य सी इच्छाए हो !!सीधे रास्ते पे चलते हुएसीधे साधे लोग और उनकी बातेंजो बोलते हो कुछ ऐसादिन की शुरुवात से लेकरबस रात तक का किस्साचकित न होते हो वे अपने या दूसरों केपहनावे पर , या बोलचाल पर !!बेमतलब की बातचीत रहेजिसका कोई अंत नहीशुरू हुई कहाँ …

अमावस्या !!

पडे आभाळ अपुरेजीव गुंतता जिवातहूर हूर लावी मनारोज सावळा एकांत चंद्र नसे चांदण्यातत्याचा चालतो जुगारवाटे अधिकच शांतअंधारातला अंधार व्हावे अकस्मात काहीवीज चमकते जशीक्षणभर का होईनादेते जाण प्रकाशाची येणे तुझे असे जसेपूर्ण चंद्राचे आकाशजाता परतूनि पुन्हाउरे रिक्त अमावस !!

तुम मुझे क्षमा करो ( राजकमल चौधरी )

तुम मुझे क्षमा करो बहुत अंधी थीं मेरी प्रार्थनाएँ।मुस्कुराहटें मेरी विवशकिसी भी चंद्रमा के चतुर्दिकउगा नहीं पाई आकाश-गंगालगातार फूल-चंद्रमुखी!बहुत अंधी थीं मेरी प्रार्थनाएँ।मुस्कुराहटें मेरी विकलनहीं कर पाई तय वे पद-चिन्ह।मेरे प्रति तुम्हारी राग-अस्थिरता,अपराध-आकांक्षा नेविस्मय ने-जिन्हें,काल के सीमाहीन मरुथल परसजाया था अकारण, उस दिनअनाधार।मेरी प्रार्थनाएँ तुम्हारे लिएनहीं बन सकींगान,मुझे क्षमा करो।मैं एक सच्चाई थीतुमने कभी मुझको …

ख्वाब की तरह (इफ्तिकार आरिफ़)

ख़्वाब की तरह बिखर जाने को जी चाहता हैऐसी तन्हाई कि मर जाने को जी चाहता है घर की वहशत से लरज़ता हूँ मगर जाने क्यूँशाम होती है तो घर जाने को जी चाहता है डूब जाऊँ तो कोई मौज निशाँ तक न बताएऐसी नदी में उतर जाने को जी चाहता है कभी मिल जाए …

सूना घर ( दुष्यंत कुमार )

सूने घर में किस तरह सहेजूँ मन को। पहले तो लगा कि अब आईं तुम, आकरअब हँसी की लहरें काँपी दीवारों परखिड़कियाँ खुलीं अब लिये किसी आनन को। पर कोई आया गया न कोई बोलाखुद मैंने ही घर का दरवाजा खोलाआदतवश आवाजें दीं सूनेपन को। फिर घर की खामोशी भर आई मन मेंचूड़ियाँ खनकती नहीं …

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